आपका बॉयफ्रेंड या गर्लफेंड आपसे कितना प्यार करता/करती है, इसकी सच्चाई हिडन कैमरे के जरिए बताने वाला रिऐलिटी शो 'इमोशनल अत्याचार' इन दिनों काफी फेमस हो गया है। पिछले दिनों इसमें एक 10 साल का रिश्ता टूटते हुए दिखाया गया। बॉयफ्रेंड ने महज चार दिनों से मिल रही एक खूबसूरत लड़की को अपनी 10 साल पुरानी गर्लफ्रेंड के बारे में झूठी कहानी सुना डाली। इस प्रोग्राम में 50-60 नहीं, बल्कि 100 पर्सेंट मामलों में रिश्ते टूट जाते हैं। अपने पार्टनर से धोखेबाजी में लड़कियां भी पीछे नहीं दिखीं। महज एंटरटेनमेंट के लिए बना यह रिऐलिटी शो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमें अपने लवर पर आंख बंद करके भरोसा करना चाहिए?
किसी भी प्रेमी या प्रेमिका (या पति-पत्नी) के दिमाग में यह डाउट हमेशा बना रहता है कि जो बंदा या बंदी आपके सामने सात जन्मों के साथ की कसमें खा रहा/रही है, वह कोई मौका मिलते ही कहीं उसे स्वीकार तो नहीं कर लेगा? अगर उस ऑफर में सेक्स जुड़ा हो तो इसकी संभावना और बढ़ जाती है क्योंकि जैसा कि शेक्सपीयर के एक नाटक में कहा गया है - जब वासना का ज्वार आता है तो बुद्धि खिड़की के रास्ते बाहर चली जाती है। जाहिर है, किसी को जबर्दस्ती किसी के साथ नहीं रखा जा सकता, लेकिन कोई मौका मिलते ही बॉयफ्रेंड -गर्लफ्रेंड का एकदम से बदल जाना लॉयल्टी और भरोसे की बुनियाद पर ही सवाल खड़े करता है। इस बारे में एक बहस छिड़ी तो एक शादीशुदा जनाब ने यहां तक कह डाला कि 80 पर्सेंट शादियां सिर्फ इसलिए टिकी रहती हैं कि उनके ऊपर बच्चों की जिम्मेदारी होती है। बच्चे न हों तो वे कब के अलग हो जाते! मैं उनका पर्सनल एक्स्पीरियंस समझकर चुप हो गई। बार-बार दिमाग में एक बात आई कि वे करोड़ों रिश्ते जो आज भी कायम हैं, वे क्या सिर्फ इसलिए कायम हैं कि उनमें किसी जासूसी कैमरे वाला एक्स्पेरिमेंट नहीं किया गया है और इसी कारण बेवफाई का पता नहीं चल पाया है, या उन कपल्स में इतना भरोसा है और प्यार है कि उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।
देखा जाए तो आजकल के लव बर्ड्स काफी ओपन हैं। वे एक-दूसरे को स्पेस देते हैं, रिस्पेक्ट देते हैं, उन्हें उनके दोस्तों के साथ अक्सेप्ट करते हैं। ऐसी कोई शर्त नहीं होती कि लड़का या लड़की नए रिश्ते में बंधेंगे तो पुराने तोड़ देंगे, लेकिन लगता है कि यह सबकुछ भी कम पड़ रहा है। किसी को और अधिक स्पेस (दूसरे शब्दों में छूट) चाहिए तो कहीं किसी को और ज्यादा स्मार्ट पार्टनर की तलाश है। ये पुराने पार्टनर को एक सब्स्टिट्यूट की तरह साथ रखकर किसी और से फ्लर्ट करने में कोई बुराई नहीं समझते। मैं यहां यंग जेनरेशन को गलत ठहराने और पुराने कपल्स की तरफदारी करने की कोशिश नहीं कर रही क्योंकि एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात नई नहीं है। पहले भी वे होते थे लेकिन बात घर की चारदीवारी में दब कर रह जाती थी क्योंकि महिलाएं बाहर नहीं आती थीं। आज लड़कियां बड़ी संख्या में बाहर निकल रही हैं, इसलिए ऐसे अफेयर भी ज्यादा हो रहे हैं और सामने भी ज्यादा आ रहे हैं।
'इमोशनल अत्याचार' काफी हिट हो रहा है। लवर्स के एक-दूसरे को चीट करते रंगे हाथ पकड़े जाने पर ऑडियंस को बड़ा मज़ा आ रहा है। सोचती हूं, टीवी सेट के सामने बैठे लवर्स या कपल्स के दिमाग में प्रोग्राम देखते समय क्या गुज़रता होगा? क्या वे यह सोच कर खुश हो रहे होंगे कि हमारे जीवन में ऐसा कुछ नहीं है, या उनके दिमाग में भी शक का बीज पड़ रहा होगा? या फिर उनके अपने जीवन का कोई ऐसा ही सच उनके सामने नाचने लगता होगा?
dilli ke her rang, her khushi,her gum ko hum pahuchaenge aap tak kyonki ye hai dilli ka dil dillidhadkan
Wednesday, December 29, 2010
Saturday, December 25, 2010
लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं ,प्याज़ दो ...
आजकल आम लोगो का जीना दूभर हो गया है जंहा देखो महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है और हाल ही में दूध के भाव भी बढ़ गए हैं। दोस्तों , डेयरी भले ही मदर के नाम की है, पर वहां के भाव सुनकर ग्रैंडमदर याद आ जाती हैं। दूध के भाव बढ़कर जहां पहुंच रहे हैं, वहां पर उनके पहुंचने से आने वाले दिनों में चोरी की खबरें बदल जाएंगी। आने वाले दिनों में चोरी, डाके की कुछ खबरें इस तरह से होंगी।
आनंद विहार इलाके में चिर परिचित अंदाज में पुराने चोर नए मकान में घुसे और दूध को कब्जे में ले लिया। शोर मचाने के बावजूद चोर सारा दूध पीकर ही गए। चोरों ने सोने चांदी और दूसरे आइटमों को हाथ भी नहीं लगाया। ऐसा लगता है कि वह पहले से प्लानिंग करके दूध को ही निशाना बनाने के लिए आए थे। स्थानीय पुलिस ने साफ कर दिया है कि वह सोने चांदी की सुरक्षा तो कर सकती है, पर दूध के मामले में नागरिकों को खुद ही जागरूक रहना होगा। पब्लिक को यह करना चाहिए कि डेयरी से दूध लेने के बाद उसे सीधे बैंकों के लॉकर में जमा कर दे। खबरें हैं कि बैंकों ने दूध को लॉकर में रखने के भाव बढ़ा दिए हैं, क्योंकि कई ग्राहक एक बार दूध रखने के बाद कई सालों तक निकालने नहीं आते। पूरे इलाके में सड़े दूध की बदबू फैल जाती है।
प्रीत विहार इलाके में हुई राहजनी में सरेआम राहजन एक गृहिणी से दूध की तीन थैलियां छीन कर चले गए। गृहिणी ने दूध के बदले अपने जेवर देने की पेशकश की, तो चोरों ने कहा कि वह सिर्फ दूध ही लूटते हैं।
पिछले महीने प्याज़ 70 रुपये किलो बिक रही थी। कुछ दिनों बाद इस तरह की खबरें आ सकती हैं :
जनकपुरी में दो परिवारों में प्याज़ को लेकर तनातनी हो गई है। सूत्रों के मुताबिक दोनों परिवारों के बच्चों की शादी के लिए तय मात्रा में सोना देने की बात तय हुई थी। बाद में लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं, हमें उसके बदले प्याज़ दी जाए। लड़की वालों ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा कि इस तरह से सोने की जगह प्याज़ नहीं लाई जा सकती। मूंग की दाल नब्बे रुपये किलो और अरहर की दाल 68 रुपये किलो चल रही है।
इनके भाव सुनकर हार्ट फेल होने की नौबत सी आ गई है। जल्दी ही दालों के भाव बताने का अंदाज भी बदलने वाला है। दस रुपये की अरहर बीस रुपये के मूंग के भाव होने वाले हैं। पर किलो के हिसाब के नहीं, दस रुपये में अरहर का एक दाना और बीस रुपये में मूंग का एक दाना दिखाया जाएगा। खरीदने के लिए तो बैंक गारंटी पेश करनी पड़ेगी। होम डिलिवरी की जाएगी, पुलिस प्रॉटेक्शन के साथ। कोई शरीफ ग्राहक एकाध किलो मूंग लेकर यूं ही निकल गया, तो राहजनी हो लेगी। चलूं, आज रात भर जागना है, क्योंकि चोरी का खतरा है, कल रात सौ ग्राम दूध बच गया है न।
आनंद विहार इलाके में चिर परिचित अंदाज में पुराने चोर नए मकान में घुसे और दूध को कब्जे में ले लिया। शोर मचाने के बावजूद चोर सारा दूध पीकर ही गए। चोरों ने सोने चांदी और दूसरे आइटमों को हाथ भी नहीं लगाया। ऐसा लगता है कि वह पहले से प्लानिंग करके दूध को ही निशाना बनाने के लिए आए थे। स्थानीय पुलिस ने साफ कर दिया है कि वह सोने चांदी की सुरक्षा तो कर सकती है, पर दूध के मामले में नागरिकों को खुद ही जागरूक रहना होगा। पब्लिक को यह करना चाहिए कि डेयरी से दूध लेने के बाद उसे सीधे बैंकों के लॉकर में जमा कर दे। खबरें हैं कि बैंकों ने दूध को लॉकर में रखने के भाव बढ़ा दिए हैं, क्योंकि कई ग्राहक एक बार दूध रखने के बाद कई सालों तक निकालने नहीं आते। पूरे इलाके में सड़े दूध की बदबू फैल जाती है।
प्रीत विहार इलाके में हुई राहजनी में सरेआम राहजन एक गृहिणी से दूध की तीन थैलियां छीन कर चले गए। गृहिणी ने दूध के बदले अपने जेवर देने की पेशकश की, तो चोरों ने कहा कि वह सिर्फ दूध ही लूटते हैं।
पिछले महीने प्याज़ 70 रुपये किलो बिक रही थी। कुछ दिनों बाद इस तरह की खबरें आ सकती हैं :
जनकपुरी में दो परिवारों में प्याज़ को लेकर तनातनी हो गई है। सूत्रों के मुताबिक दोनों परिवारों के बच्चों की शादी के लिए तय मात्रा में सोना देने की बात तय हुई थी। बाद में लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं, हमें उसके बदले प्याज़ दी जाए। लड़की वालों ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा कि इस तरह से सोने की जगह प्याज़ नहीं लाई जा सकती। मूंग की दाल नब्बे रुपये किलो और अरहर की दाल 68 रुपये किलो चल रही है।
इनके भाव सुनकर हार्ट फेल होने की नौबत सी आ गई है। जल्दी ही दालों के भाव बताने का अंदाज भी बदलने वाला है। दस रुपये की अरहर बीस रुपये के मूंग के भाव होने वाले हैं। पर किलो के हिसाब के नहीं, दस रुपये में अरहर का एक दाना और बीस रुपये में मूंग का एक दाना दिखाया जाएगा। खरीदने के लिए तो बैंक गारंटी पेश करनी पड़ेगी। होम डिलिवरी की जाएगी, पुलिस प्रॉटेक्शन के साथ। कोई शरीफ ग्राहक एकाध किलो मूंग लेकर यूं ही निकल गया, तो राहजनी हो लेगी। चलूं, आज रात भर जागना है, क्योंकि चोरी का खतरा है, कल रात सौ ग्राम दूध बच गया है न।
Saturday, December 11, 2010
डीटीसी बसों की असलियत
डीटीसी की बसों की 'असलियत' जानने के लिए जब डीटीसी के ही अफसर सड़कों पर आए तो उन्हें कई ऐसी कमियां नजर आई
जो शायद इससे पहले उन्होंने कभी देखी ही न हों। कुछ रूटों पर तो उन्हें एक के बाद एक कई बसें साथ-साथ दौड़ती नजर आयीं जबकि कुछ रूट ऐसे भी थे, जहां लंबे इंतजार के बाद बस पहुंची भी तो इतनी भरी हुई कि पैसेंजरों के लिए उसमें चढ़ना ही मुश्किल था। यही नहीं, कई बसों में तो कर्मचारी वदीर् में ही नहीं थे। यह असलियत सोमवार को उस वक्त सामने आई, जब डीटीसी के लगभग दो सौ अफसरों को चेकिंग के लिए सड़कों पर उतारा गया। अब डीटीसी का कहना है कि इस फीडबैक के आधार पर ही आगे जरूरी बदलाव भी किए जाएंगे और हर पखवाड़े में इस तरह की एक्सरसाइज भी की जाएगी ताकि सड़कों पर बस सर्विस की असलियत सामने आ सके।
डीटीसी सूत्रों के मुताबिक डीटीसी चेयरमैन नरेश कुमार ने सड़कों पर चल रही डीटीसी बसों की परफॉर्मेंस जानने के लिए अपने विभाग के डिप्टी मैनेजर से लेकर चीफ जनरल मैनेजर स्तर तक के लगभग दो सौ अधिकारियों को बसों में जाकर उनका इंस्पेक्शन करने के निदेर्श दिए। इन अफसरों से कहा गया कि वे ये देखें कि बसें अपने तय शेडयूल के मुताबिक चल रही हैं या नहीं। बसों में सफाई कैसी है, कर्मचारियों का व्यवहार कैसा है और बसों के बोर्ड पर रूट नंबर आ रहे हैं या नहीं।
डीटीसी सूत्रों का कहना है कि इस निदेर्श के बाद लगभग दो सौ अधिकारियों ने दिल्ली में इन बसों का जायजा लिया। इनमें डीटीसी का ट्रैफिक स्टाफ भी शामिल था। सूत्रों का कहना है कि अब तक कुछ अफसरों ने अपना फीडबैक मैनेजमेंट को दिया है। इस फीडबैक में बताया गया है कि कुछ रूटों पर बंचिंग की समस्या सामने आई यानी एक के बाद एक कई बसें आ रही थीं और वे भी खाली। जबकि दूसरी तरफ कुछ रूटों पर बसों की कमी थी।
डीटीसी के ही एक अधिकारी ने उदाहरण देते हुए बताया कि बदरपुर से गुड़गांव के रूट पर बसें पैसेंजरों से बुरी तरह भरी हुई थीं यानी उस रूट पर बसों की तादाद कम है। इसी तरह कुछ जगह पर ड्राइवर-कंडक्टर अपनी वदीर् में ही नहीं थे।
डीटीसी चेयरमैन नरेश कुमार ने एनबीटी को बताया कि इस फीडबैक से यह पता चला है कि कुछ जगह बसों के टाइम टेबल को रिशेड्यूल करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फीडबैक के आधार पर आगे जो भी जरूरी कदम हैं, वे उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह एक्सरसाइज हर 15 दिन में की जाएगी ताकि अपडेट मिलता रहे। उन्होंने कहा कि डीटीसी को जल्द ही और ड्राइवर मिल जाएंगे, इसके बाद वह अपनी पूरे बेड़े का 90 फीसदी बसें सड़कों पर उतार सकेगी। वैसे सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर डीटीसी की 4929 बसें चलीं।
डीटीसी सूत्रों के मुताबिक डीटीसी चेयरमैन नरेश कुमार ने सड़कों पर चल रही डीटीसी बसों की परफॉर्मेंस जानने के लिए अपने विभाग के डिप्टी मैनेजर से लेकर चीफ जनरल मैनेजर स्तर तक के लगभग दो सौ अधिकारियों को बसों में जाकर उनका इंस्पेक्शन करने के निदेर्श दिए। इन अफसरों से कहा गया कि वे ये देखें कि बसें अपने तय शेडयूल के मुताबिक चल रही हैं या नहीं। बसों में सफाई कैसी है, कर्मचारियों का व्यवहार कैसा है और बसों के बोर्ड पर रूट नंबर आ रहे हैं या नहीं।
डीटीसी सूत्रों का कहना है कि इस निदेर्श के बाद लगभग दो सौ अधिकारियों ने दिल्ली में इन बसों का जायजा लिया। इनमें डीटीसी का ट्रैफिक स्टाफ भी शामिल था। सूत्रों का कहना है कि अब तक कुछ अफसरों ने अपना फीडबैक मैनेजमेंट को दिया है। इस फीडबैक में बताया गया है कि कुछ रूटों पर बंचिंग की समस्या सामने आई यानी एक के बाद एक कई बसें आ रही थीं और वे भी खाली। जबकि दूसरी तरफ कुछ रूटों पर बसों की कमी थी।
डीटीसी के ही एक अधिकारी ने उदाहरण देते हुए बताया कि बदरपुर से गुड़गांव के रूट पर बसें पैसेंजरों से बुरी तरह भरी हुई थीं यानी उस रूट पर बसों की तादाद कम है। इसी तरह कुछ जगह पर ड्राइवर-कंडक्टर अपनी वदीर् में ही नहीं थे।
डीटीसी चेयरमैन नरेश कुमार ने एनबीटी को बताया कि इस फीडबैक से यह पता चला है कि कुछ जगह बसों के टाइम टेबल को रिशेड्यूल करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फीडबैक के आधार पर आगे जो भी जरूरी कदम हैं, वे उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह एक्सरसाइज हर 15 दिन में की जाएगी ताकि अपडेट मिलता रहे। उन्होंने कहा कि डीटीसी को जल्द ही और ड्राइवर मिल जाएंगे, इसके बाद वह अपनी पूरे बेड़े का 90 फीसदी बसें सड़कों पर उतार सकेगी। वैसे सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर डीटीसी की 4929 बसें चलीं।
Thursday, December 2, 2010
. और ख़त्म हो गया नालंदा विश्वविद्यालय......
नालंदा विश्वविद्यालय, वास्तव में उसका नाम नालंद था, जिस तरह अंग्रेजी के कारण योग को योगा, मिश्र को मिश्रा आदि बना दिया ऐसे ही नालंद के नाम में भी परिवर्तन हुआ | नालंद का संधि विग्रह है न + आलम+ द | अलम शब्द का अर्थ है पर्याप्त ,इस प्रकार उसका अर्थ हुआ पर्याप्त से अधिक शिक्षा देने वाला | वैसे नालंदा के बारे में काफी पढ़ा... था और सुना था लेकिन ये नहीं पता की उसका विनाश कैसे हुआ ? अभी पढ़ा तो पता लगा की अलाउद्दीन खिलजी के भतीजे बख्तियार खिलजी ने इस विश्विद्यालय को समाप्त कर दिया, नालंदा की इमारत को ज़मिदोज़ करा कर वहाँ के छात्र ,आचार्यों को मार दिया | वहाँ के पुस्तकालय में आग लगा दी गयी, और वहाँ का पुस्तकालय पुस्तकों से इतना समृद्ध था की वहाँ लगी आग छह महीने तक जलती रही थी |
इसे पढ़ कर दिमाग में एक प्रश्न आया की पुस्तकालय को यदि न जलाया गया होता तो कितनी कीमती और ज्ञानवर्धक पुस्तकें आज हमारे पास मौजूद होती | क्योकि कहा जाता है की किसी देश का साहित्य या पुस्तकें/ग्रन्थ/ उसकी अमूल्य धरोहर होती है और संस्कृतिक सम्पन्नता को प्रदर्शित करती है | इसके बाद एक प्रश्न और कौंधा की जब मुगलों ने इतने अत्याचार हमारे देश पर किये है तो हम क्यों पांचवी कक्षा से बी.ए., एम.ए और आगे भी हम इन मुगलों को पढ़ रहे है क्या ये एक ज़ख्म कुरेदने जैसा नहीं है, और जो पढ़ रहे है वो भी वास्तविकता नहीं है ज्यादातर बातें छुपा दी गयी जैसे उनका धर्म परिवर्तन करना, न मानने पर सर कलम कर देना, मंदिरों को तोडना, और उनको लूटना,हिन्दू प्रजा पर अन्यों के मुकाबले दोगुना कर लगाना,ज्यादातर धार्मिक त्योहारों पर रोक लगा देना , आदि आदि | समझ नहीं आता की क्यों हमारी सरकार या शिक्षा संस्थान कोई वाजिब कदम उठा कर शिक्षा का स्वरुप नहीं बदलते ? क्या हमारा इतिहास सिर्फ मुगलों तक सीमित था, क्या हमारा हमारे पास मुगलों को पढने के अलावा कोई और चारा नहीं है | हर देश में स्वतंत्रता के बाद हर उस चीज़ के निशाँ मिटाए जाते है जो गुलामी के प्रतीक होते है और एक हम है जो सिर्फ गुलामी के प्रतीकों को अपने भविष्य में ढ़ो रहे है,और संजो के रख रहे है .
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