Monday, September 27, 2010

कौन है ज़िम्मेदार ????

राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर जो भारतीय कभी उत्साहित हुआ करते थे  आज वही भारतीय ख़ुद को शर्मिंदा महसूस कर रहे है  और खेलों की आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और खेल मंत्री एमएस गिल तक सब आलोचनाओं के निशाने पर हैं ! लेकिन क्या गलती सिर्फ इनकी है ? आज सवाल को कई है पर जवाब सिर्फ चुनिन्दा !जो मेहनत दिल्ली सरकार अब कर रही है जब  राष्ट्रमंडल खेलों को शुरू होने में केवल ६ दिन बाकि है वही मेहनत ४ साल पहले की होती तो आज दिल्ली और देश को इतना शर्मिंदा न होना पड़ता !आज हालत तो ये है कि कई विदेशी खिलाडी भारत आना ही नहीं चाहते और जो आ रहे है वो यहाँ आकर खुश नहीं है !
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने काम समय से न होने पर ना जाने किस किस को फटकार लगायी लेकिन सवाल उठता है कि इतने दिनों तक वह कहाँ थे जब खेलो का काम रेंगते हुए किया जा रहा था ! जिन खेलों को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया उसकी तैयारी सही चल रही है या नहीं ये समय रहते देखना क्या प्रधानमंत्री का काम नहीं था?
कलमाड़ी ने इस साल की शुरुआत  में कहा था कि हर चीज़ की आख़िरी ज़िम्मेदारी मेरी है क्योंकि मैं आयोजन समिति का प्रमुख हूँ लेकिन कलमाड़ी जी अब आपको क्या हुआ ?इतनी शर्मिंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए आप सामने क्यों नहीं आते और अब आपसे ये भी नहीं कहा जा रहा कि इस सारी गड़बड़ी , नकामियाबी और बदनामी के प्रमुख आप है !
वैसे इन खेलो में जो हजारो करोडो रुपए स्वाहा किये गए काश ये इस देश कि गरीबी,पढाई , इलाज और उन इलाको में लगाये जाते जहा लोग बाढ़ और सूखे से ग्रस्त है जिन्हें एक वक़्त कि रोटी तक नहीं मिलती! लेकिन इन खेलो के कारण कुछ लोगो को फायदा भी हुआ हमारे देश के गरीब नेताओ को, जो बेचारे इस देश का पैसा खाते खाते थकते ही नहीं !
                                       यह मेरा देश है
                                      हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
                                       फैला हुआ,
                                       जली हुई मिट्टी का ढेर है
                                       जहा हर तीसरी जुबान का मतलब -
                                       नफरत है !
                                      साजिश है !
                                       अँधेरा है !
                                     यह मेरा देश है ! 

Sunday, September 26, 2010

दूर जाती हिंदी ???????

"भारत माता की बिंदी हूँ
मैं तुम्हारी हिंदी हूँ
यह ना पूछो मुझसे ,
की हाल मेरा कैसा है
अपनों के बिच पराये जैसा है !"

पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों और न्यूज़ चेंनलो ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का इस्तेमाल धड़ल्ले से शुरू कर दिया है.
इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको इस्तेमाल करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट !  लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषा का ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है? चाहे जो भी हो लेकिन आज का युवा हिंदी बोलने में अपने आप को असहाय महसूस करता है शायद इसके ज़िम्मेदार  कुछ ऐसे स्कूल भी है जो हिंदी को अपने स्कूल के विषयों में जगह नहीं देते आज इनकी जगह इंग्लिश,फ्रेंच जैसे विषयों ने ले ली है और तो और अब तो युवाओ को भी हिंदी बोलने में शर्म आती है !
क्या ऐसे बच पाएगा हमारी मात्र भाषा का अस्तित्व ? क्या संस्कृत के बाद हिंदी भी लुप्त हो जाएगी ?
" हिंदी हमारी मात्र भाषा है ,मात्र एक भाषा नहीं ".....

Monday, September 20, 2010

पानी पानी हुई दिल्ली

दो दिन से लगातार हो रही बारिश ने जहा दिल्ली के मौसम  को सुहाना बना रखा है वही  लोगो कि परेशानियों को भी बढ़ा दिया है! आज हर जगह सिर्फ जल भराव देखने हो मिल रहा है चाहे वो घर हो या सड़क  ! कभी दिल्ली वाले  पानी के लिए बिलगते है तो आज पानी से ही  परेशान है !कभी हरियाणा के आगे हाथ फैला- फैला के पानी मांगते थे तो आज उन्ही को  हथिनी कुंड से और पानी ना छोड़ने के लिए हाथ फैला रहे है !कभी हरियाणा पानी देना नहीं चाहता था अब बीन मांगे ही दे रहा है  और अब दिल्ली वाले इतना पानी लेना नहीं चाहते !आज हर टीवी चैनल पर दिल्ली में बाढ़ कि खबरों ने जोर पकड़ रखा है लेकिन हल किसी के पास नहीं है ! दिल्ली वाले हर साल इश्वर के सामने हाथ जोड़ कर पानी मांगते है कि आज घर में पानी आ जाए  इसलिए इस बार इश्वर ने दिल खोल कर दिल्ली वालो को पानी दिया है जो उनसे संभाले नहीं संभल रहा !