राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर जो भारतीय कभी उत्साहित हुआ करते थे आज वही भारतीय ख़ुद को शर्मिंदा महसूस कर रहे है और खेलों की आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और खेल मंत्री एमएस गिल तक सब आलोचनाओं के निशाने पर हैं ! लेकिन क्या गलती सिर्फ इनकी है ? आज सवाल को कई है पर जवाब सिर्फ चुनिन्दा !जो मेहनत दिल्ली सरकार अब कर रही है जब राष्ट्रमंडल खेलों को शुरू होने में केवल ६ दिन बाकि है वही मेहनत ४ साल पहले की होती तो आज दिल्ली और देश को इतना शर्मिंदा न होना पड़ता !आज हालत तो ये है कि कई विदेशी खिलाडी भारत आना ही नहीं चाहते और जो आ रहे है वो यहाँ आकर खुश नहीं है !
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने काम समय से न होने पर ना जाने किस किस को फटकार लगायी लेकिन सवाल उठता है कि इतने दिनों तक वह कहाँ थे जब खेलो का काम रेंगते हुए किया जा रहा था ! जिन खेलों को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया उसकी तैयारी सही चल रही है या नहीं ये समय रहते देखना क्या प्रधानमंत्री का काम नहीं था?
कलमाड़ी ने इस साल की शुरुआत में कहा था कि हर चीज़ की आख़िरी ज़िम्मेदारी मेरी है क्योंकि मैं आयोजन समिति का प्रमुख हूँ लेकिन कलमाड़ी जी अब आपको क्या हुआ ?इतनी शर्मिंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए आप सामने क्यों नहीं आते और अब आपसे ये भी नहीं कहा जा रहा कि इस सारी गड़बड़ी , नकामियाबी और बदनामी के प्रमुख आप है !
वैसे इन खेलो में जो हजारो करोडो रुपए स्वाहा किये गए काश ये इस देश कि गरीबी,पढाई , इलाज और उन इलाको में लगाये जाते जहा लोग बाढ़ और सूखे से ग्रस्त है जिन्हें एक वक़्त कि रोटी तक नहीं मिलती! लेकिन इन खेलो के कारण कुछ लोगो को फायदा भी हुआ हमारे देश के गरीब नेताओ को, जो बेचारे इस देश का पैसा खाते खाते थकते ही नहीं !
यह मेरा देश है
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ,
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहा हर तीसरी जुबान का मतलब -
नफरत है !
साजिश है !
अँधेरा है !
यह मेरा देश है !

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