Sunday, November 14, 2010

क्या है मेरी गलती ?

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ..

मुझे भी जीने का अधिकार है,
पर लगता है ..अब सब ख्वाब है !
सदियों का अँधियारा ओढ़े,
मैं उजियारा खोज रही हूँ !
संशय के इस कूड़े में ,
मैं एक सहारा खोज रही हूँ !

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........

करते करते विरोध अब थक चुकी हूँ ,
पुरुषो कि इस दुनियां  से अब, ऊब चुकी हूँ !
 बीच सड़क पर जब भी चलती ,
हज़ार निगाहे है मुझे घूरती !
मुझे देख न जाने कितने मुस्काते ,
और कितने ही ललचाते  !

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........

मैं उन लोगो के चहरे भूल नहीं पाती,
और इसी डर से रात भर सो नहीं पाती !
जाने कल का सवेरा क्या दिखलाएगा और फिर ना जाने ...
कल कौन  सा हादसा हो जाएगा.............
                                     प्रतिभा

1 comment:

  1. बहुत उम्दा, अव्वल, और मार्मिक कविता है आपने सारे स्त्री दर्द को यु आसानी से बयां कर दिया |

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