क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ..
मुझे भी जीने का अधिकार है,
पर लगता है ..अब सब ख्वाब है !
सदियों का अँधियारा ओढ़े,
मैं उजियारा खोज रही हूँ !
संशय के इस कूड़े में ,
मैं एक सहारा खोज रही हूँ !
क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........
करते करते विरोध अब थक चुकी हूँ ,
पुरुषो कि इस दुनियां से अब, ऊब चुकी हूँ !
बीच सड़क पर जब भी चलती ,
हज़ार निगाहे है मुझे घूरती !
मुझे देख न जाने कितने मुस्काते ,
और कितने ही ललचाते !
क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........
मैं उन लोगो के चहरे भूल नहीं पाती,
और इसी डर से रात भर सो नहीं पाती !
जाने कल का सवेरा क्या दिखलाएगा और फिर ना जाने ...
कल कौन सा हादसा हो जाएगा.............
प्रतिभा
बहुत उम्दा, अव्वल, और मार्मिक कविता है आपने सारे स्त्री दर्द को यु आसानी से बयां कर दिया |
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