Friday, November 25, 2011

मेरी जम्मू यात्रा

दिल्ली की वो कोहरे भरी शाम और घर में मेरा हर तरफ माँ को आवाज़ लगा कर ये कहना कि मम्मा मुझे ये नही मिल रहा, वो नही मिल रहा और दूसरी तरफ बार बार मेरे दोस्तों का फ़ोन आना | जैसे तैसे सारा सामान समेत कर रेलवे स्टेशन के लिए निकल गयी लेकिन न चाहते हुए भी  लेट हो गयी  और  वहा खड़े मेरे ५ दोस्तों ने  मेरा  मुक्को से स्वागत किया (ऐसा स्वागत किसी को प्राप्त न हो बहुत दर्द होता है ) लेकिन शुक्र है ट्रेन प्लेटफोर्म पर खडी थी वर्ना न जाने उस दिन मेरा क्या होता  | ट्रेन तय समय से चल पड़ी और हम पांचो ने सारी ट्रेन अपने सर पर उठा रखी थी हद तो तब हो गयी जब बगल वाली सीट पर सोए एक व्यक्ति ने हमें यह कह दिया कि ' सो जाओ रात हो गयी है शोर मचा के रखा है . अब भला हम जैसे उल्लू एक साथ हो तो नींद तो आही नही सकती | लेकिन न जाने कब बतियाते बतियाते आंख लग गयी और जब आँख खुली तो ट्रेन  पूरी खाली थी आखिर अलार्म कि तरह चाए वालो कि आवाज़ जो गूंज रही थी ( सारी नींद ख़राब कर के रख दी थी ) | सारा माहौल देख कर यह ज़ाहिर हो रहा था कि हम जम्मू पहुँच गए लेकिन हमे  माता वैष्णो देवी के दर्शन करने कटरा तक का अभी सफ़र अभी और करना था इसलिए रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर किसी साधन कि व्यवस्था करने लगे लेकिन वहा सैकड़ो  कि संख्या में खड़े बस, गाड़ी ,टेम्पो और न जाने क्या क्या सवारियों के इंतजार में खड़े थे | लेकिन देखते ही देखते बड़ी संक्या में कुछ लोग हमारे पास आए और अपने साधनों क़ी खूबिया बताने लगे ,कुछ तो हमारे बैग पकड़ कर अपनी गाड़ी क़ी तरफ ले जाने लगे जैसे तैसे हमने अपने बेगो को संभाला और एक बस में बैठ गए ( प्रति व्यक्ति ५० रुपये किराया ) |बस ने हमे २ घंटे में कटरा पंहुचा दिया , कटरा पहुच कर मन को एक राहत मिली क़ी चलो आखिर अपनी मंजिल पहुँच ही गए | लेकिन अभी एक परेशानी और बाकि थी क़ी आखिर ठहरेंगे कहा तो कुछ होटलों का मुआयना किया और फिर एक होटल क़ी तमाम खूबियों से प्रभावित होकर हमने उस होटल में २ कमरे लिए लेकिन जैसा क़ी होटल के मालिक ने हमे भांति भांति प्रकार क़ी सुविधाओ से अवगत कराया था उसमे से आधी  सुविधाए न जाने कब का दम तोड़ चुकी थी जैसे टीवी में केबल न आना ,  गरम पानी क़ी चोबीस घंटे सुविधा लेकिन बाथरूम में नही और भी  पता नही क्या क्या | चलो जैसे तैसे हमने एडजस्ट कर ही लिया और १४ किलोमीटर क़ी चढ़ाई करने के लिए तैयार हो गए |हर तरफ खुबसूरत पहाड़ ,एक छोटी सी नदी जो उसे और भी सुंदर बना रही थी | हर तरफ भीड़ ,कुछ लोग चढ़ाई चढ़ रहे थे तो कुछ उतर रहे थे, दुकानों से माता के भजनों कि आवाज़  | सब कुछ मन मोह लेने वाला था | लेकिन जहा ६ नमूने हो और वहा लड़ाई न होती ऐसा तो हो ही नही सकता था | जैसे ही माता के दर्शन करने के लिए निकले न जाने किस बात को लेकर सब में बहस हो गयी और हम २ टुकड़ियो में में बट गए| बस फिर क्या था जय माता दी ,जय माता दी के नारों के बीच में थोड़ी बहुत बहस  का सिलसिला चलता रहा जब तक की हम अर्धकुआरी नही पहुच गए | थके हारे एक लम्बी लाइन में खड़े जय माता दी बोलते रहे ,४ घंटे बाद अर्धकुआरी के दर्शन प्राप्त हुए लेकिन वैष्णो माता के दर्शन करने के लिए अभी भी २ किलोमीटर  की चढाई और एक लम्बी कतार हमारा इंतजार कर रही थी| न शरीर में प्राण थे न मुह में जबान बस एक कदम और एक कदम और करते करते हम अपनी मंजिल तक पहुच ही गए | माता के सामने खड़े होकर अपनी फर्मायिशो की लम्बी चौड़ी लिस्ट सुना दी |बस तब मन को ऐसी शांति मिली मानो अब परीक्षायो में हम ही अव्वल  आने वाले हो |मंदिर से बाहर निकल कर हमने कुछ देर विश्राम किया और फिर २ किलोमीटर और चल पड़े क्योंकि अभी हमे भैरो  बाबा के दर्शन जो करने थे क्योकि यहाँ की यही मान्यता है की जब तक भैरो बाबा के दर्शन न हो यात्रा पूरीं नही मानी जाती | जितना दर्द पहाड़ को चढ़ने में हुआ  उससे ज्यादा दर्द पहाड़ उतरते वक़्त हुआ | उस वक़्त तो हम सभी को ऐसा एहसास हो रहा था की कोई  हमे हमारे कमरे तक पंहुचा दे या कृपया करके लिफ्ट की सुविधा प्राप्त करवा दे | अगली सुबह तक माता की कृपा से हम सब सुरक्षित अपने होटल के कमरों में पहुच गए और ऐसा सोये की अगले दिन सबकी नींद खुली | जिसके बाद हमने आस पास के बाजारों का मुआयना किया और ढेर सारी वस्तुए अपने दोस्तों और परिजनों के लिए खरीदी ( यहाँ हर वस्तु के दाम पर तोल मोल होता है कृपया एक दाम देकर स्वयं कि जेब खाली न करे ) |आखिरकार  हम वापस दिल्ली आ गए लेकिन साथ में बहुत सारी खट्टी मिट्ठी यादो के साथ जो जीवन के एक यादगार पृष्ट के रूप में सज गया | 

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