Sunday, March 13, 2011


                                     जे.एन.यू. छात्र संघ चुनाव




जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से एक है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथ-साथ इजराइल-फ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच न सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जन-आंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को न सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं

लेकिन जे.एन.यू. छात्रसंघ का चुनाव पिछले तीन सालों से छात्र संघ चुनाव संबंधी लिंगदोह कमेटी से असहमतियों के चलते नहीं हो सका है | लड़ाई न्यायालय में जारी है | पर इधर चुनाव न होने से पनपी राजनीतिक-निष्क्रियता से प्रशासन अपनी नीतियों में निरंकुश और छात्र-हित-विरोधी भी होता जा रहा है |वही यूथ फॉर इक्वेलिटी के कार्यकारी सदस्य अमित कुमार का कहना है कि लिंगदोह कमेटी कि सिफारिशे एक खुबसूरत  तोहफा है और हमारी पार्टी ने हमेशा लिंगदोह कमेटी का स्वागत किया है लेकिन इसमें एक आद बाते ऐसी है जिसमे बदलाव कि आवश्यकता है जैसे आयु सीमा | हमारे अनुसार २८ वर्ष कि जो आयु है उसे बढ़ा देना चाहिए क्योंकि कुछ कारणों से छात्र कि शिक्षा में रुकावत आ सकती है और उसकी आयु २८ वर्ष से ज्यादा हो सकती है | 
दूसरी ओर डी एस यू कि कार्यकारी सदस्य बनोज्योत्सना का कहना है कि हमारी पार्टी लिंगदोह कमेटी के खिलाफ है क्योंकि लिंगदोह कमेटी छात्र लिंगदोह कि नीतियों के अनुसार छात्र संग का निर्माण होता है तो वह पूरी तरह प्रशासन कि मुट्ठी में रहेगा तथा प्रशासन इसे अपनी तरह इस्तेमाल करेगी जब देश में अलग- अलग जगहों पर चुनाव विचारधारा पर नही बल्कि फ़ेसवैल्यू, जाति, धर्म के समीकरणों पर लड़े जा रहे हों तब सबकी नजरें  जे एन यू के छात्रों की ओर हैं । पिछले तीन सालों से कैम्पस में छात्र संघ चुनाव नही हुये हैं और जिसका असर  सभी देख रहे हैं । चुनाव इस कैम्पस के लिये महज छात्र प्रतिनिधि चुनने भर कि प्रक्रिया नही है बल्कि छात्रसंघ चुनाव इस कैम्पस की सांस्कृतिक परंपरा , हमारे आम जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। जे.एन.यू. छात्र संघ के चुनावों ने सालों से इस देश के सामने लोकतंत्र का एक आदर्श रखा है। इस कैम्पस में हम अपने छात्र प्रतिनिधियों से चुनाव के पहले सवाल करते हैं , उनके पिछले साल के कामों का लेखा जोखा माँगते हैं , उनसे जुड़े हुए राजनैतिक दलों की नीतियों और कामों पर सवाल खड़े करते रहे हैं । जे.एन.यू. के चुनावों ने हमे वो लोकतांत्रिक माहौल मुहैया कराया है जहाँ हम अपने अधिकारों, सरकार की नीतियों को बहस के दायरे में ला सकें । देश के तमाम अन्य विश्वविद्यालय जहाँ कई सालों से चुनाव नही हो रहे वहाँ कैम्पस प्रशासन ने सुनियोजित तरीके से छात्रों से अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार भी छीन लिया है ।

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