मेरा देश होते जा रहा है लंगड़ा ,
और कानून नहीं हो रहा खड़ा !
कौन करना चाहता है इसका बटवारा,
और यहाँ सब बनते जा रहे है आवारा!
जो मन में आता है वो करते है,
इनके चक्कर मैं ना जाने इतने लोग मरते है!
मेरा देश होते जा रहा है बेचारा,
और किसी के पास नहीं है कोई चारा!
कब बुझेगी आतंकवाद और अन्याय की यह आग,
उस दिन लिखूंगी एक नया राग !
अब दुसरो पर निर्भेर रहना छोड़ना होगा ,
और युवाओ को ही इस देश को प्रगति की ओर मोड़ना
होगा!
- : प्रतिभा
अच्छी कविता है | उम्मीद है आप जैसे युवाओ से जो देश के लिए सोचते है |
ReplyDeleteआपका बहुत बहुत धन्यवाद समर्थ जी, उम्मीद है आप भी देश की प्रगति में अपना सहयोग ज़रूर देंगे !
ReplyDeleteachhi kavita kai plz likhte rahana .
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