Monday, August 23, 2010

एक उम्मीद

मेरा देश होते जा रहा है लंगड़ा ,
और कानून नहीं हो रहा खड़ा !
कौन करना चाहता है इसका बटवारा,
और यहाँ सब बनते जा रहे है आवारा!
जो मन में आता है वो करते है,
इनके चक्कर  मैं ना जाने इतने लोग मरते है!
मेरा देश होते जा रहा है बेचारा,
और किसी के पास नहीं है कोई चारा!
कब बुझेगी आतंकवाद और अन्याय की यह आग,
उस दिन लिखूंगी एक नया राग !
अब दुसरो पर निर्भेर रहना छोड़ना होगा ,
और युवाओ  को ही इस देश को प्रगति की ओर मोड़ना
होगा!
                                    - :  प्रतिभा

3 comments:

  1. अच्छी कविता है | उम्मीद है आप जैसे युवाओ से जो देश के लिए सोचते है |

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  2. आपका बहुत बहुत धन्यवाद समर्थ जी, उम्मीद है आप भी देश की प्रगति में अपना सहयोग ज़रूर देंगे !

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