"भारत माता की बिंदी हूँ
मैं तुम्हारी हिंदी हूँ
यह ना पूछो मुझसे ,
की हाल मेरा कैसा है
अपनों के बिच पराये जैसा है !"
पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों और न्यूज़ चेंनलो ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का इस्तेमाल धड़ल्ले से शुरू कर दिया है.
इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको इस्तेमाल करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट ! लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषा का ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है? चाहे जो भी हो लेकिन आज का युवा हिंदी बोलने में अपने आप को असहाय महसूस करता है शायद इसके ज़िम्मेदार कुछ ऐसे स्कूल भी है जो हिंदी को अपने स्कूल के विषयों में जगह नहीं देते आज इनकी जगह इंग्लिश,फ्रेंच जैसे विषयों ने ले ली है और तो और अब तो युवाओ को भी हिंदी बोलने में शर्म आती है !
क्या ऐसे बच पाएगा हमारी मात्र भाषा का अस्तित्व ? क्या संस्कृत के बाद हिंदी भी लुप्त हो जाएगी ?
" हिंदी हमारी मात्र भाषा है ,मात्र एक भाषा नहीं ".....

nice post i proud that u r my frnd...
ReplyDeleteबहुत अच्छा लेख!....शुभकामनायें...मगर संस्कृत अभी लुप्त नहीं हुई है..और हिन्दी को हम होने नहीं देंगे....एक और बात जो आज के अतिअत्याधुनिक युवाओं को समझनी होगी कि उन्हें यदि हिन्दी पर गर्व है तो कम से कम उसकी तारीफ़ अंग्रेज़ी में न करें,और कुछ नहीं बस ज़रा सुर बिगङ जाता है....एक बार पुन: शुभकामनायें
ReplyDeleteविषय अच्छा है, पर लेख को थोडा सा विस्तिरित करो और थोडा और शोध कर के लिखो... केवल ब्लॉग पर मैटर भरने ke पीछे मत रहो...
ReplyDeleteआप सब का बहुत बहुत धन्यवाद और अभिषेक जी कुछ लेख छोटे होने के बावजूद भी बहुत कुछ कह जाते है ,कई बार लेख लम्बे करने के चक्कर में लेख लेख नहीं रह जाता !
ReplyDeleteएक चीज़ समझ नहीं आती है की अनूप जी को किसी न किसी से समस्या ही रहती है | मेरा मानना की अगर किसी से शिकायत है तो मुह पर कहे क्यों दबे छिपे शब्दों से विरोध करते है और पता नहीं इनका शिकायत का दौर कब ख़तम होगा किस किस को समझायेंगे | सबको समझाने से अच्छा है खुद को समझा लें |
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