Saturday, November 27, 2010

दिल्ली दिल वालो की

   सब इसे गरियाते रहते हैं। हर तीसरा शख्स इसकी कमियां गिनाता दिख जाएगा। बातचीत में जरा-सा छेड़ने भर की देर है, इसकी खिंचाई करते समय हर कोई लाठी लेकर दौड़ पड़ता है। आप कहेंगे - ये कौन? अरे दिल्ली, और कौन।

पूछिए, दिल्ली कैसी है? दिल्ली-बॉर्न कहेंगे, दिल्ली बहुत प्यारी है। लेकिन जो यहां पैदा नहीं हुआ और खाने-कमाने के लिए दिल्ली में आ बसा है, वह कहेगा, बस कट रही है किसी तरह... वरना यहां धरा ही क्या है। लोग ऐसे हैं, लोग वैसे हैं, सिस्टम ऐसा है, सिस्टम वैसा है.. और फिर शुरू होगा दिल्ली की मिट्टी पलीद करने का अंतहीन सिलसिला। सच तो यह है कि दिल्ली से बाहर से आ कर बसे लोग नहीं जानते हैं कि इसके बारे में प्यारा क्या है? या फिर वे जानते तो हैं पर सबके सामने स्वीकारना नहीं चाहते। न स्वीकारें, किसका क्या जाता है? दिल्ली का कुछ नहीं बिगड़ता। दिल्ली अगर एक व्यक्ति का नाम है तो दिल्ली की पर्सनैलिटी में एक कंसिस्टेंसी तो है ही।



दिल्ली यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल आदि से आए और यहां फल-फूल रहे लोगों की गालियां सुन कर भी नित नए आंगुतकों को दुत्कारती नहीं। दिल्ली का यह स्वभाव ही नहीं कि वह दुत्कारे, भगा दे। अरे भई, दिल्ली मुंबई थोड़े ही है। मुंबई में तो दो जून की रोटी भी भारी पड़ जाती है और जहां कभी-कभी स्टार-यार-कलाकार बनने का सपना ले कर आया आदमी जब पूरी तरह से निराश हो जाता है तो वापस लौट जाता है, अपने गांव कस्बे की ओर। दिल्ली कभी भी नहीं दुत्कारती। दिल्ली तो कहती है,  'भई अपने-अपने हिस्से का सपना यहां जियो। जैसा यहां रहना चाहते हो, रहो। जो करना चाहते हो, करो। तुम्हारी संस्कृति और तुम्हारे लाइफस्टाइल को मैं अपने साथ ऐसे घुलामिला लूंगी कि तुम यहां से जाना ही नहीं चाहोगे।'

ऐसा होता भी है। राजधानी की मुख्यमंत्री ने कहा कि बाहर से आए लोगों की वजह से दिल्ली पर दबाव बढ़ा है। लोगों को बुरा लगा। इन लोगों में दिल्ली बॉर्न भी थे, और बाहरी प्रदेशों के लोग भी। मैडम मुख्यमंत्री की हिम्मत कैसे हुई यह बोलने की - रिसोर्सेज़ कम हैं तो रिसोर्सेज़ बढा़ओ। यह क्या कि यूपी-बिहार के लोगों पर चिल्ला-चिल्ली कर दी और अपनी असफलता उनके सिर मढ़ दी।

दिल्ली में पैदा हुआ कोई बिजनसमैन अपने यहां नौकरी देते समय यह नहीं देखता कि उसे अपने यहां एंप्लॉईज केवल और केवल मूल दिल्लीवासी ही रखने हैं। ऐसा न करने के पीछे उसकी कारोबारी जरूरतें हो सकती हैं पर फिर भी क्या कोई अनकहा क्राइटीरिया आपने देखा है जहां नॉन-डेल्हीआइट के लिए नो एंट्री हो?

मैं यही पढ़ी, पली, बड़ी हुई। मैंने खुद में या मेरे आसपास के ऐसे लोगों में, जो यहीं पैदा-वैदा हुए, कुछ ऐसा अलग नहीं देखा जो उन्हें यूपी, एमपी या बिहार के सेम परवरिश और सेम बैकग्राउंड वाले से अलग-थलग करता हो। फिर ऐसा क्यों है कि कह दिया जाता है कि ओहो,  दिल्ली के ही हो। तभी ऐसे हो। यह 'ऐसे हो'  क्या है? इसका मतलब यह बताया जाता है कि आप तेज तर्रार हैं, आप किसी की नहीं सुनते हैं, आप फैशनपरस्त हैं, आपके कैरक्टर में भी कोई न कोई,  छोटा या बडा़, लोचा है, महिला-पुरुष संबंधों को लेकर आप शर्तिया बिंदास हैं, आपने जीवन में कोई समस्या नहीं देखी है और ऐश करते हैं, ऐशोआराम से जीते हैं, आपका कोई न कोई ऊंचा रसूख जरूर है। कोई-कोई शरीफ दिखता भले ही हो पर ये लोग जुगाड़ू हैं...।

असलियत तो यह है कि दिल्ली में अपनी एक पीढ़ी से ज्यादा समय से यहीं बस रहे बंदे को जब बिहारी लिट्टी-चोखा खिलाता है तो मज़ा आ जाता है।  न जाने कितनी जरूरतें और भावनाएं जुड़ जाती हैं अपने आसपास के लोगों से। क्या फर्क पड़ता है कि वे कहां से हैं... और अगर वे कहीं बाहर (दिल्ली )  से भी हैं तो यह तो और अच्छा ही साबित होता है!!!

एक बात और,  जो कुछ ऊपर मैंने कहा, उससे यह न समझ लें कि मुंबई की बुराई कर रही हूं या मुंबई को कम आंक रही हूं। मुंबई कई मामलों में दिल्ली से कई गुना अच्छी है। सुरक्षा के मामले में तो दिल्ली से कई कदम आगे है। पर दिल्ली वाले और दिल्ली, ये सब इतना बुरा नहीं है जितना बता दिया जाता है। और अगर, दिल्ली में दिल्ली वालों में कुछ बुरा है तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि जिन लोगों से मिलकर यह बनी है, उनमें कुछ केमिकल लोचा है।

वे लोग जो बाहर से यहां खाने-कमाने आए, उन्होंने इसे मैला किया? या वे लोग, जिनकी पैदाइश परवरिश यहीं हुई, वे अचानक अमुक प्रदेश के लोगों से उनकी पहचान मालूम होते ही बुरा सलूक करने लगते हैं? मैं अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। मुझे तो यह लगता है दिल्ली एक नदी है जो सदियों से बह रही है और उसमें समय के साथ-साथ कुछ गंदगी जा मिली है। यह गंदगी हमने ही डाली है। हम यानी दिल्ली की कुल जमापूंजी इसकी आबादी। अब जब यह बदबू देने लगी है तो हम चिल्लाने लगे हैं। क्या इस गंदगी को साफ करने की अपने- अपने हिस्से की जिम्मेदारी हमें लेनी नहीं चाहिए?

Tuesday, November 23, 2010

ट्रेड फेयर.का आनंद

दिल्ली वालों की घणी आफत है। इत्ते किस्म के मेले-ठेले दिल्ली में लगते हैं कि उन्हें देखने जाए, तो आदमी बस उन्हीं का होकर रह जाये। ट्रेड फेयर हर साल आता है। इसमें इतनी अनफेयर चीजें होती हैं कि क्या बताया जाए, पार्किंग से लेकर खाने-पीने के आइटमों के भाव देखकर लगता है कि कलमाडी जी सिर्फ कॉमनवेल्थ गेम्स में ही नहीं है। ट्रेड से लेकर फेयर तक सब जगह कलमाडी ही कलमाडी ही हैं।

खैर मसला यह है कि जिन दिनों दिल्ली में ट्रेड फेयर चलता है, उन दिनों दिल्ली की आबादी को सिर्फ दो ही भागों में डिवाइड किया जा सकता है। एक तो वे जिन्होंने ट्रेड फेयर देख लिया, और दूसरे वे जिन्होंने ट्रेड फेयर नहीं देखा। ट्रेड फेयर देखने वाले ट्रेड फेयर न देखने वालों को इस निगाह से देखते हैं, मानो अमेरिका वाला कोई बंदा इथियोपिया के बंदे को देख रहा हो। दिल्ली में रहे और ट्रेड फेयर नहीं देखा, तो क्या देखा - टाइप भाव हवा में तैरता रहता है।

इस खाकसार ने एक ट्रेड फेयर गाइड लिखी है, जिसे पढ़कर लोग बगैर ट्रेड फेयर जाए हुए ही खुद को ट्रेड फेयर में गया घोषित कर सकते हैं। इस गाइड के कतिपय महत्वपूर्ण अंश इस प्रकार हैं-

1. जब आपसे कोई पूछे कि ताइवान से आया हुए वो वाला बिजली का उपकरण देखा या नहीं, आप फौरन पूछें कि अरे फॉरेन हाल में वो वाला कंप्यूटर देखा कि नहीं, जिसमें आदमी को कंप्यूटर फाइल में कन्वर्ट करके उसका ईमेल कर दिया जाता है। दिल्ली से ईमेल करो तो बंदे को डाउनलोड करो अमेरिका में।  इस डिवाइस को सुनने के बाद किसी की हिम्मत नहीं है कि आपसे पूछ ले कि वह मशीन या यंत्र देखा या नहीं।

2. बहुत ठगी है - यह बात आप आंख मूंदकर ट्रेड फेयर के बारे में कह सकते हैं। कोई भी यकीन कर लेगा। ठगों और ठगी पर पब्लिक का भरोसा इतना पक्का हो गया है कि पब्लिक मानकर चलती है कि ठगी तो एकदम नेचरल तो एकदम नेचरल चीज है, ईमानदारी कहीं कहीं और कभी कभी दिखती है और कम से कम दिल्ली में तो नहीं दिखती।

3. इस बार के मेले में वह बात नहीं है। यह भी एकदम सेफ टाइप का स्टेटमेंट है, जिससे हर कोई सहमत हो सकता है। किसी भी मेले में वो वाली बात नहीं होती, जो पहले के सालों में मेले में होती है। पिछले साल लुच्चों ने जिन लड़कियों को घूरा था, वो इस साल नहीं आयीं, ससुराल चली गईं। इस साल जो लड़कियां आईं हैं, वो अगले साल ना आएंगी। कुल मिलाकर लुच्चों से लेकर सच्चे तक यह बयान दे सकते हैं कि इस बार के ट्रेड फेयर में वह बात नहीं है।

4. हमारे रामपुर में मेला इससे भी बड़ा लगता है - यह बात बेखटके कही जा सकती है टिपिकल दिल्ली वाले से। टिपिकल दिल्ली वाले को पूरी दिल्ली का ही पता नहीं होता, दिल्ली के बाहर के इलाकों के बारे में उससे बेतकल्लुफ होकर झूठ बोला जा सकता है।

5. अब ट्रेड फेयर का क्राउड कुछ ऐसे ही टाइप हो गया है। सब इससे सहमत होंगे। दिल्ली वाले खुद को छोड़कर बाकी सबको ऐसा-वैसा क्राउड ही मानते हैं। 

Sunday, November 14, 2010

क्या है मेरी गलती ?

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ..

मुझे भी जीने का अधिकार है,
पर लगता है ..अब सब ख्वाब है !
सदियों का अँधियारा ओढ़े,
मैं उजियारा खोज रही हूँ !
संशय के इस कूड़े में ,
मैं एक सहारा खोज रही हूँ !

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........

करते करते विरोध अब थक चुकी हूँ ,
पुरुषो कि इस दुनियां  से अब, ऊब चुकी हूँ !
 बीच सड़क पर जब भी चलती ,
हज़ार निगाहे है मुझे घूरती !
मुझे देख न जाने कितने मुस्काते ,
और कितने ही ललचाते  !

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........

मैं उन लोगो के चहरे भूल नहीं पाती,
और इसी डर से रात भर सो नहीं पाती !
जाने कल का सवेरा क्या दिखलाएगा और फिर ना जाने ...
कल कौन  सा हादसा हो जाएगा.............
                                     प्रतिभा

Thursday, November 11, 2010

जलवा

खबर है कि दिल्ली में जितने इंसान दिखते हैं, उससे ज्यादा संख्या मोबाइलों की है। दिल्ली में कुल इंसानों की तादाद 1 करोड़ 83 लाख है, पर मोबाइलों की संख्या इससे 1 करोड़ ज्यादा यानी 2 करोड़ 83 लाख है।
आदमी कम हैं, मोबाइल ज्यादा है। वैसे दिल्ली में आदमी कम ही हैं, दिखते भर ज्यादा हैं। दिल्ली में आम तौर पर आदमी इतनी स्पीड से भागता दौड़ता रहता है कि वह आदमी कम, मोबाइल ज्यादा लगता है। जैसे आदमी-आदमी में फर्क है, वैसे ही मोबाइल-मोबाइल में फर्क है।

आदमी-आदमी के स्टेटस में फर्क है और मोबाइल-मोबाइल स्टेटस में फर्क है। मोबाइल स्टेटस को लेकर कई लोगों में कई भ्रांतियां हैं। इस कॉलम में उन भ्रांतियों को दूर करने की कोशिश की गई है। निम्नलिखित सवाल-जवाबों से अपनी भ्रांतियां दूर करें।
सवाल: मैंने 70,000 रुपये का मोबाइल खरीदा है। इससे अपना जलवा कैसे कायम किया जा सकता है।
जवाब: देखिए इसे जेब में रखकर न चलें। खुलेआम हाथ में रखकर घूमा करें। हो सकता है कि इससे मोबाइल की सेफ्टी कुछ कम हो जाए, पर इससे आपका स्टेटस बढ़ लेगा। स्टेटस चाहिए, तो सेफ्टी पर आपको कंप्रोमाइज करना होगा। जहां भी कोई बंदा नजर आ जाए, फौरन मोबाइल हाथ में लेकर मोबाइल पर कुछ बात करने का अभिनय करिए।
बीच-बीच में सामने वाले बंदे की ओर भी देखते रहिए। वह कुछ न कहे, तो अपनी तरफ से कहिए - इत्ता महंगा मोबाइल, फिर भी सारे फीचर नहीं हैं। यह सुनकर सामने वाले में अगर थोड़ी भी तमीज होगी, तो वह पूछेगा - कित्ते का लिया। तब फौरन आप जुट जाइए, यह बताने में कि 70,000 का है। बहुत महंगा है। इसमें ये ये फीचर हैं। आदमी को फाइल बनाकर ई-मेल कर सकते हैं इस मोबाइल से।

इस मोबाइल में लता मंगेशकर का गाना ऐसे आता है, मानो वह मोबाइल से बाहर निकल कर आपके लिए खुद गाने लगती हैं। जब सुनने वाला थोड़ा चकराए, तो आप कहिए, ये सारे फीचर्स बताए गए हैं। अभी टेस्ट करके नहीं देखे हैं। फिर आप बताइए कि मोबाइल फोन तो ऐसा होना चाहिए, जिसमें आदमी की आवाज ही नहीं, खुद आदमी निकल कर बाहर आ जाए। अगर आपके 70,000 के मोबाइल के बारे में फिर भी कोई न पूछे, तो इसके म्यूजिक प्लेयर को फुल वॉल्यूम के साथ ऑन कर दीजिए और उसमें 'मुन्नी बदनाम हुई' या इसी प्रजाति का कोई गाना बजाइए।

फुल वॉल्यूम सुनकर कुछ लोग ऑबजेक्शन करेंगे, तो उन्हे बताइए कि यह बहुत महंगा वाला मोबाइल है 70,000 रुपये का। इसके म्यूजिक प्लेयर को ऑन करना तो उन्हें आता है, पर ऑफ करना नहीं आता।

सवाल: मेरे पास 1,000 रुपये वाला मोबाइल है। इससे स्टेटस कैसे बनाया जा सकता है।
जवाब: यू चिरकुट, 1,000 रुपये में स्टेटस बनाएगा। इस मोबाइल से कम से कम बात की जाए और बात करने के फौरन बाद इसे जेब में रख लिया जाए। ये मोबाइल किसी को दिखना नहीं चाहिए। वरना लोग आपको दो कौड़ी का आदमी समझने लगेंगे। आजकल बंदे का कैरेक्टर नहीं, मोबाइल देखा जाता है। अच्छे कैरेक्टर वालों के मोबाइल अच्छे नहीं होते, और बुरे कैरेक्टर वालों के मोबाइल बुरे न होते।

यानी अपना कैरेक्टर खराब करने में लग जाएं, स्मगलिंग जैसे किसी काम की तरफ रुख करें। स्टेटस के साथ मोबाइल भी सुधर जाएगा। जी, आजकल के टाइम में कोई आदमी या ना सुधरे, मोबाइल जरूर सुधरा हुआ होना चाहिए।

Monday, October 25, 2010

इसकी टेंशन, उसकी टेंशन पता नहीं किस किस की टेंशन...........

आज सुबह से ही किसी बात को लेकर मैं टेंशन में थी तो अचानक मन में ये बात आई  कि आखिर ये टेंशन क्यों होती है ? तो सोचा क्यों ना टेंशन को मेंशन किया जाये  वैसे दोस्तों कमाल की चीज़ है ये टेंशन..इसके जलवे तो हर जगह देखने को मिलते है माफ़  कीजिए  ये तो कहानी घर घर कि है  और तो और कोई हीरो हिरोइन पॉपुलर  हो ना हो जनाब  ये टेंशन बहुत मशहूर होती जा रही है खास तौर से  शहरों में !कभी अपने पुराने मित्रो से मिलने जाओ तो मिलने कि ख़ुशी से ज्यादा उनकी टेंशन में होने कि कहानियां  सुनने में समय बीत जाता है ,पड़ोसियों को सामने  वाले के घर  को देख टेंशन ,बच्चो  को पढाई कि टेंशन,माँ बाप को बच्चो कि टेंशन , बीबी को घर पर रोज खाना बनाने की  टेंशन ,पति को रोज़ काम पर जाने कि टेंशन, कवारों को शादी की टेंशन , लड़के को लड़की की टेंशन,,,इसकी टेंशन, उसकी टेंशन पता नहीं किस किस की टेंशन...........
        ऊफ .... आखिर ये टेंशन होती क्यों है ? इसका जवाब देना मेरे लिए भी मुश्किल है क्योंकि मैं भी इस टेंशन की शिकार हूँ ,लेकिन दोस्तों शायद इसका जवाब हमारी खुद की ज़िन्दगी में मिल जाएगा ....वो कैसे ? तो सोचिए क्या हम पहले की तरह बाहर निकल कर खुली हवा में रहते  है ,क्या माँ बाप अपने बच्चे को समय देते है ,क्या बच्चे कम्प्यूटर की दुनियां  के आलावा किसी और  को अपना दोस्त मानते है ...आज किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है  और बस अगर  हमें कोई समय देता है या हम किसी को समय देते है तो वो केवल हमारे अपनी टेंशन को .........
आज भी मुझे वो समय याद है जब मैं ८ साल की थी और १५ अगस्त को अपने भईया के साथ छत्त पर पतंग उड़ाने गयी थी वो बात अलग है की मुझे हमेशा की तरह चरखी पकड़ा दी गयी  लेकिन मुझे उस में भी बहुत ख़ुशी मिलती थी और सबसे ज्यादा उन रंग बिरंगी पतंगों को देख कर जो सारे आसमान को रंगीन कर देती थी और मैं भईया से कहती थी भईया आज तो लाखो पतंगे उड़ रही है ना ....अगर ये सारी पतंगे हमारे पास आ जाए तो कितना मज़ा आयेगा ना ... फिर मेरे भईया मेरी तरफ देख कर हंसने  लगे ! वैसे आप सोच रहे होंगे की मैंने ये बात आपको क्यों बताई क्योंकि आज ना मुझे वो बच्चो की "आई बो" का शोर  सुनाई देता  है और ना ही वो रंगीन असमान दिखाई पड़ता है ! लोग कहते है शहर में समय चलता नहीं  दौड़ता है और समय के साथ हमें दौड़ना पड़ता है लेकिन  शायद इस दौड़ हम कही ना कही अपनी खुशियाँ ,अपने और अपने दोस्तों को पीछे छोड़ते जा रहे है बस आज कोई सबकी ज़िन्दगी में अव्वल  है तो वो है टेंशन .....इसलिए अपनी ज़िन्दगी का थोडा समय अपने अपनों को दे ताकि इनकी जगह  कोई टेंशन ना ले सके ....".ना टेंशन लेने का और ना किसी को देना का ".........

Wednesday, October 20, 2010

कब सुधरेंगे ये पाकिस्तानी

वैसे तो मुझे भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई बातें समझ में नहीं आती, लेकिन यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती कि अचानक बैठे बिठाए बात प्यार, मुहब्बत और शांति से शुरु होते होते गाली-गलौज में कैसे बदल जाती है.कभी कभी तो मेरी समझ से बाहर हो जाता है कि हमारे देश को क्या हो जाता है .माफ़ किजिएगा इस देश को चलने वाले नेताओ को .जब देखो शरीफ  बनने का ढोंग करते रहते है कभी पाकिस्तान के लिए इतना प्यार उमड़ जाता है कि जिसकी  कोई सीमा नहीं वही पाकिस्तान पीठ में छुरा घोपने से बाज़ नहीं आता . वैसे आज मेरे एक मित्र के पास एक साईट पर फ्रेंड रिकुएस्त  आई जिसे देख कर ऐसा लगा जैसे इन पाकिस्तानी बेशर्मो का कुछ नहीं हो सकता किसी ने सही कहा है लातो के भुत बातो से नहीं मानते .

भारत- हम पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिरता चाहते हैं. एक मज़बूत पाकिस्तान भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के हित में है.
पाकिस्तान- हम भारत के साथ समग्र बातचीत का स्वागत करते हैं. दोनों देशों का नेतृत्व धीरे-धीरे सभी समस्याएं शांति प्रक्रिया के ज़रिए हल करने की क्षमता रखता है.
भारत- हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़े और वीज़ा नियमों में नरमी हो.
पाकिस्तान- यदि नियंत्रण रेखा की दोनों ओर से व्यापार और लोगों की अवाजाही में आसानी हो तो धीरे-धीरे सीमाएँ बे-मानी होती जली चाएँगी.
भारत- दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया अब पीछे नहीं जा सकती, लेकिन पाकिस्तान को सबसे पहले अपने यहाँ आतंकवाद के ख़िलाफ ठोस क़दम उठाने होंगे.
पाकिस्तान- दक्षिण एशिया को भारत और पाकिस्तान शांति का केंद्र बना सकते हैं, लेकिन भारत को बलोचिस्तान में हस्तक्षेप बंद करना होगा.
भारत- जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना रहेगा, बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं.
पाकिस्तान- भारत को आरोप-प्रत्यारोप से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और इलाक़े में दादा बनने का शौक़ अपने मन से निकाल देना चाहिए.
भारत- अगर चीन और पाकिस्तान से एक ही समय पर युद्ध होता है तो भारत दोनों का एक साथ मुक़ाबला करने की क्षमता रखता है.
पाकिस्तान- जनरल दीपक कपूर को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान क्या कर सकता है और भारतीय सेना कितने पानी में है.
भारत- अब तक सीमा पार से आतंकवाद हो रहा है. अमेरिका और अन्य शक्तियाँ पाकिस्तान को समझाएँ कि वह आग से न खेले.
पाकिस्तान- जिस प्रकार से हम ने पाकिस्तान हासिल किया है उसी प्रकार से कशमीर भी हासिल करेंगे. चाहे हज़ार साल तक युद्ध क्यों न करना पड़े.
भारत- क्या पाकिस्तान भूल गया कि सन् 71 में क्या हुआ था. क्या उसे दोबारा याद दिलाना पड़ेगा.
पाकिस्तान- हमारी ओर जो भी मैली आँख से देखेगा वह आँख निकाल दी जाएगी.
भारत- पाकिस्तान अपने क़द से बड़ी बात करने से पहले अपने घर की आग तो बुझाले.
पाकिस्तान- अबे तेरी तो....
भारत- अबे तेरी ऐसी की तैसी.....
(यदि भारत और पाकिस्तान किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करने पर तैयार हो जाएँ तो इलाज के पैसे मैं अपनी जेब से देने को तैयार हूँ.)

Friday, October 15, 2010

यौन शोषण के शिकार होते बच्चे

कल पूरे दिन हर न्यूज़ चैनल में एक ही खबर छाई थी कि दिल्ली में  कैसे एक व्यक्ति ७ महीनो से तीन बच्चो को अपनी हवस का शिकार बना रहा था  और माता पिता को पता भी नहीं चला वैसे ये कोई नयी खबर नहीं है क्योंकि आज हर दूसरा बच्चा अपनों का ही शिकार बन रहा है ! वैसे देखा जाए तो  देश में अगर किसी बच्चे के साथ यौन शोषण होता है तो उसके लिए अलग से कोई कानून नहीं है। एक वयस्क के साथ होने वाले यौन शोषण मामले में जो कानूनी प्रावधान है वही प्रावधान बच्चों के यौन शोषण के मामले में भी है। जबकि सरकार को भी ये अच्छी तरह पता है कि भारत में हर दूसरा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है।
बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए तीन साल पहले ऑफेंसेज अगेंस्ट चाइल्ड बिल तैयार कर दिया गया है लेकिन ये बिल तीन साल से ठंडे बस्ते में पड़ा है। जबकि सरकार के अपने ही आंकड़ों के मुताबिक देश भर में पांच साल से ज्यादा उम्र के 53 फीसदी बच्चे किसी न किसी तौर पर यौन शोषण के शिकार होते हैं लेकिन शर्म कि बात तो यह है कि सरकार  सब जानने के बाद भी कोई सख्त कदम नहीं उठाती वैसे सरकार पर निर्भेर रहने से अच्छा माता पिता को ही अपने बच्चो की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए !