Sunday, March 13, 2011


                                     जे.एन.यू. छात्र संघ चुनाव




जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से एक है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथ-साथ इजराइल-फ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच न सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जन-आंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को न सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं

लेकिन जे.एन.यू. छात्रसंघ का चुनाव पिछले तीन सालों से छात्र संघ चुनाव संबंधी लिंगदोह कमेटी से असहमतियों के चलते नहीं हो सका है | लड़ाई न्यायालय में जारी है | पर इधर चुनाव न होने से पनपी राजनीतिक-निष्क्रियता से प्रशासन अपनी नीतियों में निरंकुश और छात्र-हित-विरोधी भी होता जा रहा है |वही यूथ फॉर इक्वेलिटी के कार्यकारी सदस्य अमित कुमार का कहना है कि लिंगदोह कमेटी कि सिफारिशे एक खुबसूरत  तोहफा है और हमारी पार्टी ने हमेशा लिंगदोह कमेटी का स्वागत किया है लेकिन इसमें एक आद बाते ऐसी है जिसमे बदलाव कि आवश्यकता है जैसे आयु सीमा | हमारे अनुसार २८ वर्ष कि जो आयु है उसे बढ़ा देना चाहिए क्योंकि कुछ कारणों से छात्र कि शिक्षा में रुकावत आ सकती है और उसकी आयु २८ वर्ष से ज्यादा हो सकती है | 
दूसरी ओर डी एस यू कि कार्यकारी सदस्य बनोज्योत्सना का कहना है कि हमारी पार्टी लिंगदोह कमेटी के खिलाफ है क्योंकि लिंगदोह कमेटी छात्र लिंगदोह कि नीतियों के अनुसार छात्र संग का निर्माण होता है तो वह पूरी तरह प्रशासन कि मुट्ठी में रहेगा तथा प्रशासन इसे अपनी तरह इस्तेमाल करेगी जब देश में अलग- अलग जगहों पर चुनाव विचारधारा पर नही बल्कि फ़ेसवैल्यू, जाति, धर्म के समीकरणों पर लड़े जा रहे हों तब सबकी नजरें  जे एन यू के छात्रों की ओर हैं । पिछले तीन सालों से कैम्पस में छात्र संघ चुनाव नही हुये हैं और जिसका असर  सभी देख रहे हैं । चुनाव इस कैम्पस के लिये महज छात्र प्रतिनिधि चुनने भर कि प्रक्रिया नही है बल्कि छात्रसंघ चुनाव इस कैम्पस की सांस्कृतिक परंपरा , हमारे आम जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। जे.एन.यू. छात्र संघ के चुनावों ने सालों से इस देश के सामने लोकतंत्र का एक आदर्श रखा है। इस कैम्पस में हम अपने छात्र प्रतिनिधियों से चुनाव के पहले सवाल करते हैं , उनके पिछले साल के कामों का लेखा जोखा माँगते हैं , उनसे जुड़े हुए राजनैतिक दलों की नीतियों और कामों पर सवाल खड़े करते रहे हैं । जे.एन.यू. के चुनावों ने हमे वो लोकतांत्रिक माहौल मुहैया कराया है जहाँ हम अपने अधिकारों, सरकार की नीतियों को बहस के दायरे में ला सकें । देश के तमाम अन्य विश्वविद्यालय जहाँ कई सालों से चुनाव नही हो रहे वहाँ कैम्पस प्रशासन ने सुनियोजित तरीके से छात्रों से अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार भी छीन लिया है ।

Monday, January 17, 2011

ब्लॉगिंग करना आसान नहीं .

दोस्तों आज मैं आपसे एक गंभीर विषय या कहे समस्या पर बात करने जा रही हूँ जो मेरे जैसे नए नए चिट्ठाकारो के सामने पोस्ट लिखते समय आती है ......यह कुछ इस प्रकार है :
  1. कोई विषय न मिलना  (Blogger’ block) : कभी कभी ऐसा होता है कि आप चिठ्ठाकारी करते करते उब जाते हैं और आप को कोई नया विषय ही नहीं सूझता जिस पर आप लिख सकें। यह ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी समस्या है जिसको लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।
  2. आपके विषय पर किसी और का लिखा जाना : यह तब होता है जब आप किसी विषय पर लिखने की सोच रहे होते है पता चलता है कि किसी अन्य चिठ्ठाकार ने उसी विषय पर बहुत ही अच्छा लिख मारा है तो आप का सारा उत्साह काफूर हो जाता है।
  3. कॉलेज में लोगो द्वारा निगाह रखना  :  जो लोग अपने कॉलेज से छिप कर ब्लाग लिखते हैं उनको ये परेशानी रहती है किसी  को पता न चल जाय या फिर कोई देख न ले या फिर किसी दिन कुछ अच्छा लिखने का मन है, विषय भी तैयार है पर उसी दिन कॉलेज से काम ज्यादा मिल जाता है 
  4. बिजली का जाना :  आप ब्लॉगिंग के लिये तैयार हैं, धांसू सा विषय भी सोच लिया लेकिन जैसे ही कंप्यूटर ऑन किया कि बिजली चली गई। दिल्ली, मंबई की बात अलग है, बाकी देश में कोई गारंटी नहीं है कि कब बिजली आयेगी।
  5. इंटरनेट कनेक्शन डाउन होना : आप ने सब कुछ कर लिया। विषय चुन लिया, उस पर मैटर टाईप भी  कर लिया कर लिया, और जैसे ही पोस्ट करने बैठे कि पता चला इंटरनेट कनेक्शन डाउन हो गया और मेरे साथ तो ये समस्या कुछ ज्यादा ही है आखिर MTNL कनेक्शन जो है और एक बार तो मेरे नेट का बिल ८००० तक पंहुच गया था लेकिन इसकी कहानी फिर कभी बताउंगी......
  6.  कमाई न होना  :  ऐसा हिन्दी व अन्य भाषाओं के चिठ्ठाकारों के साथ ज्यादा होता है। अपने ब्लॉग से किसी भी प्रकार की कोई कमाई न होने से भी चिठ्ठाकार का उत्साह खत्म  हो जाता है और वो ब्लॉगिंग छोड़ देता है। 
  7. टिप्पणी न मिलना :  ये समस्या हिन्दी ब्लॉगिंग में कुछ ज्यादा है , यहां अगर किसी ब्लॉगर को प्रशंसा वाली टिप्पणियां न मिले तो उसको लगता है कि उसके लेखन को किसी ने देखा ही नहीं और वो ब्लॉगिंग के प्रति निराश हो जाता है। इसलिए कृपया मेरे लेख पर समय समय पर टिप्पणी  करते रहें
  8. कृपया मेरे ब्लॉग के नाम जैसा नाम न रखे : दोस्तों ये बहुत  गंभीर समस्या है ...मेरी कक्षा में हर दूसरा इंसान दिल्ली नाम से ब्लॉग बना रहा है अब मैं इसका कारण क्या बताऊँ ....मेरी पढ़ाई  का एक विषय ब्लॉग भी है ...एक दिन बातो बातो में मेरे अध्यापक ने मेरे ब्लॉग का उदहारण दे दिया मनो उस दिन के बाद तो मेरी कक्षा में दिल्ली नाम की लहर दोड़ गयी...  हर कोई अपने ब्लॉग का नाम करण दिल्ली जोड़ कर करने लगा ......एक बार तो मेरा मन किया की अपने ब्लॉग dillidhadkan की धड़कने ही रोक दू और अपने ब्लॉग का नाम बदल दूं फिर सोचा छड़ो यार..... बड़े बड़े देशो में छोटी छोटी बाते होती रहती है .........
 ब्लॉगिंग में और भी तमाम तरह का परेशानियां आती रहती हैं। लेकिन उत्साही चिठ्ठाकार फिर भी ब्लॉगिंग करते रहते हैं बिलकुल मेरे जैसे ......

Saturday, January 15, 2011

कौन कहता है भारत गरीब देश है ?

भारत एक गरीब देश है । अपनी गरीबी का रोना अक्सर हम रोते हैं । गरीबी पर सेमिनार करते हैं , गरीबी दूर करने की योजनाएं बनाते हैं और विदेशी दान मांगते हैं। पुराने जमाने को याद करते हुए नि:श्वास छोड़ते हैं और कहते हैं कि कभी भारत सोनी की चिड़िया हुआ करता था ।
लेकिन सच यह है कि यह सोने की चिड़िया अभी भी मौजूद है । फर्क इतना ही है कि हमारे हुक्मरानों की मिलीभगत से इसे भारत भूमि से बहुत दूर , सात समंदर पार , स्विट्जरलैण्ड के बैंकों की तिजोरियों में कैद रखा गया है । स्विस बैंकों के संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट  में वहाँ पर जमा भारतीयों की संपत्ति के जो आंकड़े जारी किए हैं  , वे हैरतअंगेज़ हैं । इन आंकड़ों के मुताबिक वहां के बैंकों में भारतीयों के 1456 अरब डॉलर जमा हैं । यह बहुत बड़ी राशि है । इसकी विशालता का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि यह पूरे भारत की कुल राष्ट्रीय आय से डेढ़ गुना है । भारत के कुल विदेशी ऋण का यह 13 गुना है । इस राशि का सालाना ब्याज ही केन्द्र सरकार के बजट से ज्यादा होगा । यदि इस राशि को वापस लाकर देश के 45 करोड़ गरीबों में बांट दिया जाए , तो हर गरीब आदमी को एक लाख रुपया मिल सकता है।
    यह स्पष्ट है कि यह काला धन है जो इस देश को लूटकर बेईमान उद्योगपतियों , दलालों , भ्रष्ट नेताओं , भ्रष्ट अफ़सरों , फिल्मी सितारों , क्रिकेट खिलाड़ियों आदि ने स्विस बैंकों में जमा किया है । इन बदनाम बैंकों में पूरी दुनिया का दो नम्बर का पैसा जमा होता है , क्योंकि यहाँ टैक्स नहीं लगता है और जमाकर्ताओं के नाम व खातों की जानकारी गोपनीय रखी जाती है । हैरानी की बात यह भी है कि स्विस बैंकों की जो मोटी जानकारी बाहर आई है , उसके मुताबिक वहाँ जमा रकम में पहले नंबर पर भारतीय हैं ।
    भारतीयों के 1456 अरब डॉलर के बाद काफ़ी पीछे , दूसरे नंबर पर 470 अरब डॉलर के साथ रूसी हैं । उसके बाद अंग्रेजों के 390 अरब डॉलर हैं , उक्रेनियनों के 100 अरब डॉलर तथा चीनियों के 96 अरब डॉलर जमा हैं । भारत के अलावा बाकी दुनिया के अमीरों का जितना धन वहाँ जमा है , सबको जोड़ भी लें, तो उससे भी ज्यादा धन भारतीयों का स्विस बैंकों में है । क्या इसे भी भारत की एक और गर्व करने लायक उपलब्धि माना जाए ? कौन कहता है कि भारत गरीब है ?................ 

Tuesday, January 11, 2011

सपने बेशकीमती होते हैं.........

सपने बेशकीमती होते हैं लेकिन उन्हें देखने के लिए कीमत नहीं देनी पड़ती। और शायद इसलिए हम सब ढेर सारे सपने देखते हैं।
हम सभी ना जाने बंद आँखों या खुली आँखों से कितने ही सपने देखते है,कुछ पाने का सपना तो कुछ बनने का सपना ......कहते है सपने कभी सच नहीं होते लेकिन मेरा मानना है सपने तो सब देखते है लेकिन कुछ ऐसे होते है जो सपने सिर्फ सच करने के लिए देखते है ...ऐसी ही एक कहानी है शरद की, सरद बाबू आईआईएम अहमदाबाद से पोस्ट ग्रैजुएट। बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग ग्रैजुएट। फूड किंग प्राइवेट लिमिटेड के नाम से केटरिंग कंपनी के मालिक। लेकिन एक दिन ऐसा भी था जब सालाना 8 करोड़ टर्नओवर वाली इस कंपनी का मालिक जो आज एक टाइम पर 5 हजार लोगों को खाना खिलाता है वो इतना भूखा था कि उसे चींटी के मुंह से नमकीन का दाना छीन कर खाना पड़ा था। शरद कहते है जब मैं 7 साल का था तो मेरी मां की हर महीने जब सैलरी आती थी तो वो मुझे भुजिया लेकर देती थीं। हम पांच भाई-बहन थे तो हमें अखबार पर थोड़ा-थोड़ा भुजिया मिलता था। लेकिन हम सभी में कॉम्पटीशन चलता था। मैं अपना भुजिया जल्दी से खाकर ये देख रहा था कि अब मुझे कौन देगा। तभी मैंने देखा उधर से एक चींटी भुजिया का एक दाना लेकर जा रही थी तो मैंने उससे नमकीन का एक दाना छीना और तुरंत खा लिया ....शरद जैसे ना जाने इतने ही लोग है जो गरीबी में रहकर कुछ कर दिखाते है लेकिन कुछ ऐसे भी है जो अपने सपने पूरे करना तो चाहते है लेकिन गरीब होने के कारण कर नहीं पाते .........इसलिए सपने देखना कभी मत छोड़ो लेकिन उसे बस सपने मत रहने दो ..............

Friday, January 7, 2011

उफ़...ये गोरा बदन

हर रोज़ की तरह आज भी मैं टीवी का रिमोट थामे कुछ  नए विज्ञापनों पर गौर  कर रही थी ...तभी सामने" फेयर एंड  लवली "का विज्ञापन दिख गया उसे देख मुझे मेरी एक मित्र की याद आ गयी जिसके बैग में किताबे हो ना हो  ... फेयर एंड लवली जरुर होती थी ....दिन में कम से कम चार बार तो क्रीम को वो चहरे पर ज़रूर लगाती थी ,एक दिन मौका मिलते ही मैंने उससे पूछ लिया यार तू इसे क्यों लगाती है ? उसका जवाब मिला.. अरे यार इससे रंग गोरा होता है ...
 दोस्तों आज की लड़कियाँ सफेद अश्व पर सवार एक सुंदर राजकुमार के सपने नहीं देखतीं। उनके स्वप्न में दिखते हैं, सफेद कार से उतरते स्मार्ट लड़के जो लडकियों को तभी पसंद करेंगे जब वह गोरी होंगी....पता नहीं आज कल लोगो की मानसिकता को क्या हो गया है ?माना की समय बदल रहा है। फिर भी कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं, जैसे कि किसी भी दंपत्ति की पुत्र की चाह। यहाँ भी विज्ञापनों नें उपभोक्ताओं की इस कमज़ोरी को ताड़ कर चतुराई से अपना उल्लू सीधा किया है। बड़ा आसान है ऐसे पिता के मस्तिष्क को पढ़ना जिसे न केवल “पुत्री” होने वरन् सांवली पुत्री होने का “शाप” मिला हो, जिसे न तो अच्छी नौकरी नसीब होगी और न ही ब्याह करना आसान होगा।जब तक गोरी बहुओं की तलाश जारी रहेगी, गोरेपन की क्रीम की तूती बोलती रहेगी। गोरा बनाने वाले सभी विज्ञापनों में एक चीज़ हमेशा सामान्य रहती है "सांवला रंग बदसूरती का सबब है और सांवलापन तुम्हारे सपनों की हर राह में रोड़े बन कर सामने आयेगा"...और भई गलती से तुम सावले हुए तो तुम्हारी खैर नहीं .....
यदि आप सोच रहे है  कि गोरेपन की क्रीम सिर्फ औरतें के लिए हैं तो जागिये जनाब ...अब तो "फेयर एंड हैंडसम " आ गयी है मर्दों को बनाये गोरा ....गोरे होने की टक्कर बराबर की है ..... वैसे क्या कोई क्रीम वाकई त्वचा का रंग बदल सकती है? इसका जवाब इमानदारी से मिले न मिले, गोरे रंग की चाहत के चलते निर्माता कंपनियों के वारे न्यारे हो रहे हैं।  चलिए अंत में आपको एक लोकप्रिय गोरेपन की क्रीम के विज्ञापन की पंक्ति बताती  हूँ “कुछ भी ऐसा नहीं जो बदला ना जा सकता हो”, वाकई! लगता है सब कुछ बदल सकता है, सिवाय गोरी चमड़ी के प्रति हमारी उपनिवेशी चाहत को छोड़ कर।

Wednesday, December 29, 2010

'इमोशनल अत्याचार'

आपका बॉयफ्रेंड या गर्लफेंड आपसे कितना प्यार करता/करती है, इसकी सच्चाई हिडन कैमरे के जरिए बताने वाला रिऐलिटी शो 'इमोशनल अत्याचार' इन दिनों काफी फेमस हो गया है। पिछले दिनों इसमें एक 10 साल का रिश्ता टूटते हुए दिखाया गया। बॉयफ्रेंड ने महज चार दिनों से मिल रही एक खूबसूरत लड़की को अपनी 10 साल पुरानी गर्लफ्रेंड के बारे में झूठी कहानी सुना डाली। इस प्रोग्राम में 50-60 नहीं, बल्कि 100 पर्सेंट मामलों में रिश्ते टूट जाते हैं। अपने पार्टनर से धोखेबाजी में लड़कियां भी पीछे नहीं दिखीं। महज एंटरटेनमेंट के लिए बना यह रिऐलिटी शो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमें अपने लवर पर आंख बंद करके भरोसा करना चाहिए?

किसी भी प्रेमी या प्रेमिका (या पति-पत्नी) के दिमाग में यह डाउट हमेशा बना रहता है कि जो बंदा या बंदी आपके सामने सात जन्मों के साथ की कसमें खा रहा/रही है, वह कोई मौका मिलते ही कहीं उसे स्वीकार तो नहीं कर लेगा? अगर उस ऑफर में सेक्स जुड़ा हो तो इसकी संभावना और बढ़ जाती है क्योंकि जैसा कि शेक्सपीयर के एक नाटक में कहा गया है - जब वासना का ज्वार आता है तो बुद्धि खिड़की के रास्ते बाहर चली जाती है।  जाहिर है, किसी को जबर्दस्ती किसी के साथ नहीं रखा जा सकता, लेकिन कोई मौका मिलते ही बॉयफ्रेंड -गर्लफ्रेंड का एकदम से बदल जाना लॉयल्टी और भरोसे की बुनियाद पर ही सवाल खड़े करता है। इस बारे में एक बहस छिड़ी तो एक शादीशुदा जनाब ने यहां तक कह डाला कि 80 पर्सेंट शादियां सिर्फ इसलिए टिकी रहती हैं कि उनके ऊपर बच्चों की जिम्मेदारी होती है। बच्चे न हों तो वे कब के अलग हो जाते! मैं उनका पर्सनल एक्स्पीरियंस समझकर चुप हो गई। बार-बार दिमाग में एक बात आई कि वे करोड़ों रिश्ते जो आज भी कायम हैं, वे क्या सिर्फ इसलिए कायम हैं कि उनमें किसी जासूसी कैमरे वाला एक्स्पेरिमेंट नहीं किया गया है और इसी कारण बेवफाई का पता नहीं चल पाया है, या उन कपल्स में इतना भरोसा है और प्यार है कि उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।

देखा जाए तो आजकल के लव बर्ड्स काफी ओपन हैं। वे एक-दूसरे को स्पेस देते हैं, रिस्पेक्ट देते हैं, उन्हें उनके दोस्तों के साथ अक्सेप्ट करते हैं। ऐसी कोई शर्त नहीं होती कि लड़का या लड़की नए रिश्ते में बंधेंगे तो पुराने तोड़ देंगे, लेकिन लगता है कि यह सबकुछ भी कम पड़ रहा है। किसी को और अधिक स्पेस (दूसरे शब्दों में छूट) चाहिए तो कहीं किसी को और ज्यादा स्मार्ट पार्टनर की तलाश है। ये पुराने पार्टनर को एक सब्स्टिट्यूट की तरह साथ रखकर किसी और से फ्लर्ट करने में कोई बुराई नहीं समझते। मैं यहां यंग जेनरेशन को गलत ठहराने और पुराने कपल्स की तरफदारी करने की कोशिश नहीं कर रही क्योंकि एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात नई नहीं है। पहले भी वे होते थे लेकिन बात घर की चारदीवारी में दब कर रह जाती थी क्योंकि महिलाएं बाहर नहीं आती थीं। आज लड़कियां बड़ी संख्या में बाहर निकल रही हैं, इसलिए ऐसे अफेयर भी ज्यादा हो रहे हैं और सामने भी ज्यादा आ रहे हैं।

'इमोशनल अत्याचार' काफी हिट हो रहा है। लवर्स के एक-दूसरे को चीट करते रंगे हाथ पकड़े जाने पर ऑडियंस को बड़ा मज़ा आ रहा है। सोचती हूं, टीवी सेट के सामने बैठे लवर्स या कपल्स के दिमाग में प्रोग्राम देखते समय क्या गुज़रता होगा? क्या वे यह सोच कर खुश हो रहे होंगे कि हमारे जीवन में ऐसा कुछ नहीं है, या उनके दिमाग में भी शक का बीज पड़ रहा होगा? या फिर उनके अपने जीवन का कोई ऐसा ही सच उनके सामने नाचने लगता होगा?

Saturday, December 25, 2010

लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं ,प्याज़ दो ...

आजकल आम लोगो का जीना दूभर हो गया है जंहा देखो महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है और हाल ही में दूध के भाव  भी बढ़ गए हैं। दोस्तों , डेयरी भले ही मदर के नाम की है, पर वहां के भाव सुनकर ग्रैंडमदर याद आ जाती हैं। दूध के भाव बढ़कर जहां पहुंच रहे हैं, वहां पर उनके पहुंचने से आने वाले दिनों में चोरी की खबरें बदल जाएंगी। आने वाले दिनों में चोरी, डाके की कुछ खबरें इस तरह से होंगी।



आनंद विहार इलाके में चिर परिचित अंदाज में पुराने चोर नए मकान में घुसे और दूध को कब्जे में ले लिया। शोर मचाने के बावजूद चोर सारा दूध पीकर ही गए। चोरों ने सोने चांदी और दूसरे आइटमों को हाथ भी नहीं लगाया। ऐसा लगता है कि वह पहले से प्लानिंग करके दूध को ही निशाना बनाने के लिए आए थे। स्थानीय पुलिस ने साफ कर दिया है कि वह सोने चांदी की सुरक्षा तो कर सकती है, पर दूध के मामले में नागरिकों को खुद ही जागरूक रहना होगा। पब्लिक को यह करना चाहिए कि डेयरी से दूध लेने के बाद उसे सीधे बैंकों के लॉकर में जमा कर दे। खबरें हैं कि बैंकों ने दूध को लॉकर में रखने के भाव बढ़ा दिए हैं, क्योंकि कई ग्राहक एक बार दूध रखने के बाद कई सालों तक निकालने नहीं आते। पूरे इलाके में सड़े दूध की बदबू फैल जाती है।

प्रीत विहार इलाके में हुई राहजनी में सरेआम राहजन एक गृहिणी से दूध की तीन थैलियां छीन कर चले गए। गृहिणी ने दूध के बदले अपने जेवर देने की पेशकश की, तो चोरों ने कहा कि वह सिर्फ दूध ही लूटते हैं।

पिछले महीने प्याज़ 70  रुपये किलो बिक रही थी।  कुछ दिनों बाद इस तरह की खबरें आ सकती हैं :

जनकपुरी में दो परिवारों में प्याज़  को लेकर तनातनी हो गई है। सूत्रों के मुताबिक दोनों परिवारों के बच्चों की शादी के लिए तय मात्रा में सोना देने की बात तय हुई थी। बाद में लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं, हमें उसके बदले प्याज़ दी जाए। लड़की वालों ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा कि इस तरह से सोने की जगह प्याज़  नहीं लाई जा सकती। मूंग की दाल नब्बे रुपये किलो और अरहर की दाल 68 रुपये किलो चल रही है।

इनके भाव सुनकर हार्ट फेल होने की नौबत सी आ गई है। जल्दी ही दालों के भाव बताने का अंदाज भी बदलने वाला है। दस रुपये की अरहर बीस रुपये के मूंग के भाव होने वाले हैं। पर किलो के हिसाब के नहीं, दस रुपये में अरहर का एक दाना और बीस रुपये में मूंग का एक दाना दिखाया जाएगा। खरीदने के लिए तो बैंक गारंटी पेश करनी पड़ेगी। होम डिलिवरी की जाएगी, पुलिस प्रॉटेक्शन के साथ। कोई शरीफ ग्राहक एकाध किलो मूंग लेकर यूं ही निकल गया, तो राहजनी हो लेगी। चलूं, आज रात भर जागना है, क्योंकि चोरी का खतरा है, कल रात सौ ग्राम दूध बच गया है न।