Monday, January 16, 2012

अस्तित्व की लड़ाई ....

किसी भी  त्यौहार , शादी  ब्याह  ,बच्चे के जन्म जैसे अनेको उत्सवो पर यह घर के दरवाजों पर दस्तक देते नज़र आ जाते है | आस पड़ोस के लोग इन्हें घूर घूर कर देखते ,कभी इन पर हस देते है तो कभी गालियाँ देकर भगा देते है| इन्हें हम हिजड़े ,छक्के ,किन्नर और न जाने किन किन नामो से पूकारते है  | इन्हें शुभ संकेतो के रूप में देखा जाता है तो इसी समाज में लोग इनसे किनारा करते हुए भी नज़र आते है लेकिन ऐसी भी क्या बेरुखी की इनके वजूद पर की सवाल खड़े कर दिए जाये | इंसान की पहचान ही उसके वजूद को जीने की वजह देती है लेकिन जब किसी से उसकी पहचान ही छीन ली जाये तब ? डर लगता है न अपनी पहचान खोने से ? लेकिन हमारे देश में ५ लाख किन्नर ऐसे है जो अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहे है| वैसे हमारे देश में कमाल की बात है कि चुनाव आयोग और जनगणना के आंकड़ों की मानें तो देशभर में एक भी किन्नर नहीं है। यह सुनकर आप चौंक सकते हैं, लेकिन यह सच है। वोटर आईडी कार्ड में लिंग वाला कॉलम भरते समय मेल या फीमेल यानी महिला या पुरुष में से एक ऑप्शन ही चुनना पड़ेगा। यानी आयोग मानता है कि देश में एक भी किन्नर नहीं है| एक तरफ तो समाज इन्हें एक तीसरी जाति के रूप में देखा जाता है तो वही सरकार आजतक इनकी पहचान दिलाने के बारे में सोचना तक ज़रूरी नहीं समझती | यह हमारे लिए शर्म की बात है कि किसी ने इस बात पर गौर करने तक की ज़हमत तक नही की लेकिन हाँ किन्नरों को देख कर हंसने ,ताने मारने और उन्हें देख कर मुंह मोड़ने में सब ज्ञानी है |
वैसे हमारे देश में आज तक किसी भी जनगणना में किन्नरों की गिनती नहीं की गई है। 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में या तो महिलाएं हैं या पुरुष हैं, लेकिन किन्नर समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं है। 2011 में शुरू हुई जनगणना में सरकार ने पहली बार लिंग वाले कॉलम में महिला या पुरुष के साथ अन्य का भी ऑप्शन दिया है। पहचान की इस लड़ाई में कई सवाल हैं। किन्नरों के लिए वोटर आईडी जैसे कार्ड में कोई पहचान नहीं दे रखी है। मोबाइल फोन की सिम लेनी हो या किसी बैंक में खाता खुलवाना हो, वोटर आईडी की जरूरत पड़ती ही है। लेकिन किन्नरों को इस आईडी के नाम पर एक झूठी पहचान ही अपने साथ ढोनी पड़ रही है। किन्नर आज भी कागजों पर केवल औरत या आदमी ही हैं। लेकिन तमाम ज़िन्दगी कागजों के सहारे नहीं जी जा सकती हर व्यक्ति समाज में अपनी पहचान बनाना चाहता है लेकिन जब यही पहचान समाज द्वारा छीन ली गयी हो तो चाहते हुए भी वह न ही इस देश का हिस्सा बन पता है न ही समाज का बस लोगो की हंसी व गुस्से का पात्र मात्र रह जाता है | लोगों की बलाएं लेने वाले किन्नरों का पीछा कर रही बलाओं को खत्म करने की फिक्र भी जरूरी है।   

Friday, November 25, 2011

मेरी जम्मू यात्रा

दिल्ली की वो कोहरे भरी शाम और घर में मेरा हर तरफ माँ को आवाज़ लगा कर ये कहना कि मम्मा मुझे ये नही मिल रहा, वो नही मिल रहा और दूसरी तरफ बार बार मेरे दोस्तों का फ़ोन आना | जैसे तैसे सारा सामान समेत कर रेलवे स्टेशन के लिए निकल गयी लेकिन न चाहते हुए भी  लेट हो गयी  और  वहा खड़े मेरे ५ दोस्तों ने  मेरा  मुक्को से स्वागत किया (ऐसा स्वागत किसी को प्राप्त न हो बहुत दर्द होता है ) लेकिन शुक्र है ट्रेन प्लेटफोर्म पर खडी थी वर्ना न जाने उस दिन मेरा क्या होता  | ट्रेन तय समय से चल पड़ी और हम पांचो ने सारी ट्रेन अपने सर पर उठा रखी थी हद तो तब हो गयी जब बगल वाली सीट पर सोए एक व्यक्ति ने हमें यह कह दिया कि ' सो जाओ रात हो गयी है शोर मचा के रखा है . अब भला हम जैसे उल्लू एक साथ हो तो नींद तो आही नही सकती | लेकिन न जाने कब बतियाते बतियाते आंख लग गयी और जब आँख खुली तो ट्रेन  पूरी खाली थी आखिर अलार्म कि तरह चाए वालो कि आवाज़ जो गूंज रही थी ( सारी नींद ख़राब कर के रख दी थी ) | सारा माहौल देख कर यह ज़ाहिर हो रहा था कि हम जम्मू पहुँच गए लेकिन हमे  माता वैष्णो देवी के दर्शन करने कटरा तक का अभी सफ़र अभी और करना था इसलिए रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर किसी साधन कि व्यवस्था करने लगे लेकिन वहा सैकड़ो  कि संख्या में खड़े बस, गाड़ी ,टेम्पो और न जाने क्या क्या सवारियों के इंतजार में खड़े थे | लेकिन देखते ही देखते बड़ी संक्या में कुछ लोग हमारे पास आए और अपने साधनों क़ी खूबिया बताने लगे ,कुछ तो हमारे बैग पकड़ कर अपनी गाड़ी क़ी तरफ ले जाने लगे जैसे तैसे हमने अपने बेगो को संभाला और एक बस में बैठ गए ( प्रति व्यक्ति ५० रुपये किराया ) |बस ने हमे २ घंटे में कटरा पंहुचा दिया , कटरा पहुच कर मन को एक राहत मिली क़ी चलो आखिर अपनी मंजिल पहुँच ही गए | लेकिन अभी एक परेशानी और बाकि थी क़ी आखिर ठहरेंगे कहा तो कुछ होटलों का मुआयना किया और फिर एक होटल क़ी तमाम खूबियों से प्रभावित होकर हमने उस होटल में २ कमरे लिए लेकिन जैसा क़ी होटल के मालिक ने हमे भांति भांति प्रकार क़ी सुविधाओ से अवगत कराया था उसमे से आधी  सुविधाए न जाने कब का दम तोड़ चुकी थी जैसे टीवी में केबल न आना ,  गरम पानी क़ी चोबीस घंटे सुविधा लेकिन बाथरूम में नही और भी  पता नही क्या क्या | चलो जैसे तैसे हमने एडजस्ट कर ही लिया और १४ किलोमीटर क़ी चढ़ाई करने के लिए तैयार हो गए |हर तरफ खुबसूरत पहाड़ ,एक छोटी सी नदी जो उसे और भी सुंदर बना रही थी | हर तरफ भीड़ ,कुछ लोग चढ़ाई चढ़ रहे थे तो कुछ उतर रहे थे, दुकानों से माता के भजनों कि आवाज़  | सब कुछ मन मोह लेने वाला था | लेकिन जहा ६ नमूने हो और वहा लड़ाई न होती ऐसा तो हो ही नही सकता था | जैसे ही माता के दर्शन करने के लिए निकले न जाने किस बात को लेकर सब में बहस हो गयी और हम २ टुकड़ियो में में बट गए| बस फिर क्या था जय माता दी ,जय माता दी के नारों के बीच में थोड़ी बहुत बहस  का सिलसिला चलता रहा जब तक की हम अर्धकुआरी नही पहुच गए | थके हारे एक लम्बी लाइन में खड़े जय माता दी बोलते रहे ,४ घंटे बाद अर्धकुआरी के दर्शन प्राप्त हुए लेकिन वैष्णो माता के दर्शन करने के लिए अभी भी २ किलोमीटर  की चढाई और एक लम्बी कतार हमारा इंतजार कर रही थी| न शरीर में प्राण थे न मुह में जबान बस एक कदम और एक कदम और करते करते हम अपनी मंजिल तक पहुच ही गए | माता के सामने खड़े होकर अपनी फर्मायिशो की लम्बी चौड़ी लिस्ट सुना दी |बस तब मन को ऐसी शांति मिली मानो अब परीक्षायो में हम ही अव्वल  आने वाले हो |मंदिर से बाहर निकल कर हमने कुछ देर विश्राम किया और फिर २ किलोमीटर और चल पड़े क्योंकि अभी हमे भैरो  बाबा के दर्शन जो करने थे क्योकि यहाँ की यही मान्यता है की जब तक भैरो बाबा के दर्शन न हो यात्रा पूरीं नही मानी जाती | जितना दर्द पहाड़ को चढ़ने में हुआ  उससे ज्यादा दर्द पहाड़ उतरते वक़्त हुआ | उस वक़्त तो हम सभी को ऐसा एहसास हो रहा था की कोई  हमे हमारे कमरे तक पंहुचा दे या कृपया करके लिफ्ट की सुविधा प्राप्त करवा दे | अगली सुबह तक माता की कृपा से हम सब सुरक्षित अपने होटल के कमरों में पहुच गए और ऐसा सोये की अगले दिन सबकी नींद खुली | जिसके बाद हमने आस पास के बाजारों का मुआयना किया और ढेर सारी वस्तुए अपने दोस्तों और परिजनों के लिए खरीदी ( यहाँ हर वस्तु के दाम पर तोल मोल होता है कृपया एक दाम देकर स्वयं कि जेब खाली न करे ) |आखिरकार  हम वापस दिल्ली आ गए लेकिन साथ में बहुत सारी खट्टी मिट्ठी यादो के साथ जो जीवन के एक यादगार पृष्ट के रूप में सज गया | 

Sunday, March 13, 2011


                                     जे.एन.यू. छात्र संघ चुनाव




जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से एक है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथ-साथ इजराइल-फ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच न सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जन-आंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को न सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं

लेकिन जे.एन.यू. छात्रसंघ का चुनाव पिछले तीन सालों से छात्र संघ चुनाव संबंधी लिंगदोह कमेटी से असहमतियों के चलते नहीं हो सका है | लड़ाई न्यायालय में जारी है | पर इधर चुनाव न होने से पनपी राजनीतिक-निष्क्रियता से प्रशासन अपनी नीतियों में निरंकुश और छात्र-हित-विरोधी भी होता जा रहा है |वही यूथ फॉर इक्वेलिटी के कार्यकारी सदस्य अमित कुमार का कहना है कि लिंगदोह कमेटी कि सिफारिशे एक खुबसूरत  तोहफा है और हमारी पार्टी ने हमेशा लिंगदोह कमेटी का स्वागत किया है लेकिन इसमें एक आद बाते ऐसी है जिसमे बदलाव कि आवश्यकता है जैसे आयु सीमा | हमारे अनुसार २८ वर्ष कि जो आयु है उसे बढ़ा देना चाहिए क्योंकि कुछ कारणों से छात्र कि शिक्षा में रुकावत आ सकती है और उसकी आयु २८ वर्ष से ज्यादा हो सकती है | 
दूसरी ओर डी एस यू कि कार्यकारी सदस्य बनोज्योत्सना का कहना है कि हमारी पार्टी लिंगदोह कमेटी के खिलाफ है क्योंकि लिंगदोह कमेटी छात्र लिंगदोह कि नीतियों के अनुसार छात्र संग का निर्माण होता है तो वह पूरी तरह प्रशासन कि मुट्ठी में रहेगा तथा प्रशासन इसे अपनी तरह इस्तेमाल करेगी जब देश में अलग- अलग जगहों पर चुनाव विचारधारा पर नही बल्कि फ़ेसवैल्यू, जाति, धर्म के समीकरणों पर लड़े जा रहे हों तब सबकी नजरें  जे एन यू के छात्रों की ओर हैं । पिछले तीन सालों से कैम्पस में छात्र संघ चुनाव नही हुये हैं और जिसका असर  सभी देख रहे हैं । चुनाव इस कैम्पस के लिये महज छात्र प्रतिनिधि चुनने भर कि प्रक्रिया नही है बल्कि छात्रसंघ चुनाव इस कैम्पस की सांस्कृतिक परंपरा , हमारे आम जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। जे.एन.यू. छात्र संघ के चुनावों ने सालों से इस देश के सामने लोकतंत्र का एक आदर्श रखा है। इस कैम्पस में हम अपने छात्र प्रतिनिधियों से चुनाव के पहले सवाल करते हैं , उनके पिछले साल के कामों का लेखा जोखा माँगते हैं , उनसे जुड़े हुए राजनैतिक दलों की नीतियों और कामों पर सवाल खड़े करते रहे हैं । जे.एन.यू. के चुनावों ने हमे वो लोकतांत्रिक माहौल मुहैया कराया है जहाँ हम अपने अधिकारों, सरकार की नीतियों को बहस के दायरे में ला सकें । देश के तमाम अन्य विश्वविद्यालय जहाँ कई सालों से चुनाव नही हो रहे वहाँ कैम्पस प्रशासन ने सुनियोजित तरीके से छात्रों से अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार भी छीन लिया है ।

Monday, January 17, 2011

ब्लॉगिंग करना आसान नहीं .

दोस्तों आज मैं आपसे एक गंभीर विषय या कहे समस्या पर बात करने जा रही हूँ जो मेरे जैसे नए नए चिट्ठाकारो के सामने पोस्ट लिखते समय आती है ......यह कुछ इस प्रकार है :
  1. कोई विषय न मिलना  (Blogger’ block) : कभी कभी ऐसा होता है कि आप चिठ्ठाकारी करते करते उब जाते हैं और आप को कोई नया विषय ही नहीं सूझता जिस पर आप लिख सकें। यह ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी समस्या है जिसको लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।
  2. आपके विषय पर किसी और का लिखा जाना : यह तब होता है जब आप किसी विषय पर लिखने की सोच रहे होते है पता चलता है कि किसी अन्य चिठ्ठाकार ने उसी विषय पर बहुत ही अच्छा लिख मारा है तो आप का सारा उत्साह काफूर हो जाता है।
  3. कॉलेज में लोगो द्वारा निगाह रखना  :  जो लोग अपने कॉलेज से छिप कर ब्लाग लिखते हैं उनको ये परेशानी रहती है किसी  को पता न चल जाय या फिर कोई देख न ले या फिर किसी दिन कुछ अच्छा लिखने का मन है, विषय भी तैयार है पर उसी दिन कॉलेज से काम ज्यादा मिल जाता है 
  4. बिजली का जाना :  आप ब्लॉगिंग के लिये तैयार हैं, धांसू सा विषय भी सोच लिया लेकिन जैसे ही कंप्यूटर ऑन किया कि बिजली चली गई। दिल्ली, मंबई की बात अलग है, बाकी देश में कोई गारंटी नहीं है कि कब बिजली आयेगी।
  5. इंटरनेट कनेक्शन डाउन होना : आप ने सब कुछ कर लिया। विषय चुन लिया, उस पर मैटर टाईप भी  कर लिया कर लिया, और जैसे ही पोस्ट करने बैठे कि पता चला इंटरनेट कनेक्शन डाउन हो गया और मेरे साथ तो ये समस्या कुछ ज्यादा ही है आखिर MTNL कनेक्शन जो है और एक बार तो मेरे नेट का बिल ८००० तक पंहुच गया था लेकिन इसकी कहानी फिर कभी बताउंगी......
  6.  कमाई न होना  :  ऐसा हिन्दी व अन्य भाषाओं के चिठ्ठाकारों के साथ ज्यादा होता है। अपने ब्लॉग से किसी भी प्रकार की कोई कमाई न होने से भी चिठ्ठाकार का उत्साह खत्म  हो जाता है और वो ब्लॉगिंग छोड़ देता है। 
  7. टिप्पणी न मिलना :  ये समस्या हिन्दी ब्लॉगिंग में कुछ ज्यादा है , यहां अगर किसी ब्लॉगर को प्रशंसा वाली टिप्पणियां न मिले तो उसको लगता है कि उसके लेखन को किसी ने देखा ही नहीं और वो ब्लॉगिंग के प्रति निराश हो जाता है। इसलिए कृपया मेरे लेख पर समय समय पर टिप्पणी  करते रहें
  8. कृपया मेरे ब्लॉग के नाम जैसा नाम न रखे : दोस्तों ये बहुत  गंभीर समस्या है ...मेरी कक्षा में हर दूसरा इंसान दिल्ली नाम से ब्लॉग बना रहा है अब मैं इसका कारण क्या बताऊँ ....मेरी पढ़ाई  का एक विषय ब्लॉग भी है ...एक दिन बातो बातो में मेरे अध्यापक ने मेरे ब्लॉग का उदहारण दे दिया मनो उस दिन के बाद तो मेरी कक्षा में दिल्ली नाम की लहर दोड़ गयी...  हर कोई अपने ब्लॉग का नाम करण दिल्ली जोड़ कर करने लगा ......एक बार तो मेरा मन किया की अपने ब्लॉग dillidhadkan की धड़कने ही रोक दू और अपने ब्लॉग का नाम बदल दूं फिर सोचा छड़ो यार..... बड़े बड़े देशो में छोटी छोटी बाते होती रहती है .........
 ब्लॉगिंग में और भी तमाम तरह का परेशानियां आती रहती हैं। लेकिन उत्साही चिठ्ठाकार फिर भी ब्लॉगिंग करते रहते हैं बिलकुल मेरे जैसे ......

Saturday, January 15, 2011

कौन कहता है भारत गरीब देश है ?

भारत एक गरीब देश है । अपनी गरीबी का रोना अक्सर हम रोते हैं । गरीबी पर सेमिनार करते हैं , गरीबी दूर करने की योजनाएं बनाते हैं और विदेशी दान मांगते हैं। पुराने जमाने को याद करते हुए नि:श्वास छोड़ते हैं और कहते हैं कि कभी भारत सोनी की चिड़िया हुआ करता था ।
लेकिन सच यह है कि यह सोने की चिड़िया अभी भी मौजूद है । फर्क इतना ही है कि हमारे हुक्मरानों की मिलीभगत से इसे भारत भूमि से बहुत दूर , सात समंदर पार , स्विट्जरलैण्ड के बैंकों की तिजोरियों में कैद रखा गया है । स्विस बैंकों के संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट  में वहाँ पर जमा भारतीयों की संपत्ति के जो आंकड़े जारी किए हैं  , वे हैरतअंगेज़ हैं । इन आंकड़ों के मुताबिक वहां के बैंकों में भारतीयों के 1456 अरब डॉलर जमा हैं । यह बहुत बड़ी राशि है । इसकी विशालता का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि यह पूरे भारत की कुल राष्ट्रीय आय से डेढ़ गुना है । भारत के कुल विदेशी ऋण का यह 13 गुना है । इस राशि का सालाना ब्याज ही केन्द्र सरकार के बजट से ज्यादा होगा । यदि इस राशि को वापस लाकर देश के 45 करोड़ गरीबों में बांट दिया जाए , तो हर गरीब आदमी को एक लाख रुपया मिल सकता है।
    यह स्पष्ट है कि यह काला धन है जो इस देश को लूटकर बेईमान उद्योगपतियों , दलालों , भ्रष्ट नेताओं , भ्रष्ट अफ़सरों , फिल्मी सितारों , क्रिकेट खिलाड़ियों आदि ने स्विस बैंकों में जमा किया है । इन बदनाम बैंकों में पूरी दुनिया का दो नम्बर का पैसा जमा होता है , क्योंकि यहाँ टैक्स नहीं लगता है और जमाकर्ताओं के नाम व खातों की जानकारी गोपनीय रखी जाती है । हैरानी की बात यह भी है कि स्विस बैंकों की जो मोटी जानकारी बाहर आई है , उसके मुताबिक वहाँ जमा रकम में पहले नंबर पर भारतीय हैं ।
    भारतीयों के 1456 अरब डॉलर के बाद काफ़ी पीछे , दूसरे नंबर पर 470 अरब डॉलर के साथ रूसी हैं । उसके बाद अंग्रेजों के 390 अरब डॉलर हैं , उक्रेनियनों के 100 अरब डॉलर तथा चीनियों के 96 अरब डॉलर जमा हैं । भारत के अलावा बाकी दुनिया के अमीरों का जितना धन वहाँ जमा है , सबको जोड़ भी लें, तो उससे भी ज्यादा धन भारतीयों का स्विस बैंकों में है । क्या इसे भी भारत की एक और गर्व करने लायक उपलब्धि माना जाए ? कौन कहता है कि भारत गरीब है ?................ 

Tuesday, January 11, 2011

सपने बेशकीमती होते हैं.........

सपने बेशकीमती होते हैं लेकिन उन्हें देखने के लिए कीमत नहीं देनी पड़ती। और शायद इसलिए हम सब ढेर सारे सपने देखते हैं।
हम सभी ना जाने बंद आँखों या खुली आँखों से कितने ही सपने देखते है,कुछ पाने का सपना तो कुछ बनने का सपना ......कहते है सपने कभी सच नहीं होते लेकिन मेरा मानना है सपने तो सब देखते है लेकिन कुछ ऐसे होते है जो सपने सिर्फ सच करने के लिए देखते है ...ऐसी ही एक कहानी है शरद की, सरद बाबू आईआईएम अहमदाबाद से पोस्ट ग्रैजुएट। बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग ग्रैजुएट। फूड किंग प्राइवेट लिमिटेड के नाम से केटरिंग कंपनी के मालिक। लेकिन एक दिन ऐसा भी था जब सालाना 8 करोड़ टर्नओवर वाली इस कंपनी का मालिक जो आज एक टाइम पर 5 हजार लोगों को खाना खिलाता है वो इतना भूखा था कि उसे चींटी के मुंह से नमकीन का दाना छीन कर खाना पड़ा था। शरद कहते है जब मैं 7 साल का था तो मेरी मां की हर महीने जब सैलरी आती थी तो वो मुझे भुजिया लेकर देती थीं। हम पांच भाई-बहन थे तो हमें अखबार पर थोड़ा-थोड़ा भुजिया मिलता था। लेकिन हम सभी में कॉम्पटीशन चलता था। मैं अपना भुजिया जल्दी से खाकर ये देख रहा था कि अब मुझे कौन देगा। तभी मैंने देखा उधर से एक चींटी भुजिया का एक दाना लेकर जा रही थी तो मैंने उससे नमकीन का एक दाना छीना और तुरंत खा लिया ....शरद जैसे ना जाने इतने ही लोग है जो गरीबी में रहकर कुछ कर दिखाते है लेकिन कुछ ऐसे भी है जो अपने सपने पूरे करना तो चाहते है लेकिन गरीब होने के कारण कर नहीं पाते .........इसलिए सपने देखना कभी मत छोड़ो लेकिन उसे बस सपने मत रहने दो ..............

Friday, January 7, 2011

उफ़...ये गोरा बदन

हर रोज़ की तरह आज भी मैं टीवी का रिमोट थामे कुछ  नए विज्ञापनों पर गौर  कर रही थी ...तभी सामने" फेयर एंड  लवली "का विज्ञापन दिख गया उसे देख मुझे मेरी एक मित्र की याद आ गयी जिसके बैग में किताबे हो ना हो  ... फेयर एंड लवली जरुर होती थी ....दिन में कम से कम चार बार तो क्रीम को वो चहरे पर ज़रूर लगाती थी ,एक दिन मौका मिलते ही मैंने उससे पूछ लिया यार तू इसे क्यों लगाती है ? उसका जवाब मिला.. अरे यार इससे रंग गोरा होता है ...
 दोस्तों आज की लड़कियाँ सफेद अश्व पर सवार एक सुंदर राजकुमार के सपने नहीं देखतीं। उनके स्वप्न में दिखते हैं, सफेद कार से उतरते स्मार्ट लड़के जो लडकियों को तभी पसंद करेंगे जब वह गोरी होंगी....पता नहीं आज कल लोगो की मानसिकता को क्या हो गया है ?माना की समय बदल रहा है। फिर भी कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं, जैसे कि किसी भी दंपत्ति की पुत्र की चाह। यहाँ भी विज्ञापनों नें उपभोक्ताओं की इस कमज़ोरी को ताड़ कर चतुराई से अपना उल्लू सीधा किया है। बड़ा आसान है ऐसे पिता के मस्तिष्क को पढ़ना जिसे न केवल “पुत्री” होने वरन् सांवली पुत्री होने का “शाप” मिला हो, जिसे न तो अच्छी नौकरी नसीब होगी और न ही ब्याह करना आसान होगा।जब तक गोरी बहुओं की तलाश जारी रहेगी, गोरेपन की क्रीम की तूती बोलती रहेगी। गोरा बनाने वाले सभी विज्ञापनों में एक चीज़ हमेशा सामान्य रहती है "सांवला रंग बदसूरती का सबब है और सांवलापन तुम्हारे सपनों की हर राह में रोड़े बन कर सामने आयेगा"...और भई गलती से तुम सावले हुए तो तुम्हारी खैर नहीं .....
यदि आप सोच रहे है  कि गोरेपन की क्रीम सिर्फ औरतें के लिए हैं तो जागिये जनाब ...अब तो "फेयर एंड हैंडसम " आ गयी है मर्दों को बनाये गोरा ....गोरे होने की टक्कर बराबर की है ..... वैसे क्या कोई क्रीम वाकई त्वचा का रंग बदल सकती है? इसका जवाब इमानदारी से मिले न मिले, गोरे रंग की चाहत के चलते निर्माता कंपनियों के वारे न्यारे हो रहे हैं।  चलिए अंत में आपको एक लोकप्रिय गोरेपन की क्रीम के विज्ञापन की पंक्ति बताती  हूँ “कुछ भी ऐसा नहीं जो बदला ना जा सकता हो”, वाकई! लगता है सब कुछ बदल सकता है, सिवाय गोरी चमड़ी के प्रति हमारी उपनिवेशी चाहत को छोड़ कर।

Wednesday, December 29, 2010

'इमोशनल अत्याचार'

आपका बॉयफ्रेंड या गर्लफेंड आपसे कितना प्यार करता/करती है, इसकी सच्चाई हिडन कैमरे के जरिए बताने वाला रिऐलिटी शो 'इमोशनल अत्याचार' इन दिनों काफी फेमस हो गया है। पिछले दिनों इसमें एक 10 साल का रिश्ता टूटते हुए दिखाया गया। बॉयफ्रेंड ने महज चार दिनों से मिल रही एक खूबसूरत लड़की को अपनी 10 साल पुरानी गर्लफ्रेंड के बारे में झूठी कहानी सुना डाली। इस प्रोग्राम में 50-60 नहीं, बल्कि 100 पर्सेंट मामलों में रिश्ते टूट जाते हैं। अपने पार्टनर से धोखेबाजी में लड़कियां भी पीछे नहीं दिखीं। महज एंटरटेनमेंट के लिए बना यह रिऐलिटी शो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमें अपने लवर पर आंख बंद करके भरोसा करना चाहिए?

किसी भी प्रेमी या प्रेमिका (या पति-पत्नी) के दिमाग में यह डाउट हमेशा बना रहता है कि जो बंदा या बंदी आपके सामने सात जन्मों के साथ की कसमें खा रहा/रही है, वह कोई मौका मिलते ही कहीं उसे स्वीकार तो नहीं कर लेगा? अगर उस ऑफर में सेक्स जुड़ा हो तो इसकी संभावना और बढ़ जाती है क्योंकि जैसा कि शेक्सपीयर के एक नाटक में कहा गया है - जब वासना का ज्वार आता है तो बुद्धि खिड़की के रास्ते बाहर चली जाती है।  जाहिर है, किसी को जबर्दस्ती किसी के साथ नहीं रखा जा सकता, लेकिन कोई मौका मिलते ही बॉयफ्रेंड -गर्लफ्रेंड का एकदम से बदल जाना लॉयल्टी और भरोसे की बुनियाद पर ही सवाल खड़े करता है। इस बारे में एक बहस छिड़ी तो एक शादीशुदा जनाब ने यहां तक कह डाला कि 80 पर्सेंट शादियां सिर्फ इसलिए टिकी रहती हैं कि उनके ऊपर बच्चों की जिम्मेदारी होती है। बच्चे न हों तो वे कब के अलग हो जाते! मैं उनका पर्सनल एक्स्पीरियंस समझकर चुप हो गई। बार-बार दिमाग में एक बात आई कि वे करोड़ों रिश्ते जो आज भी कायम हैं, वे क्या सिर्फ इसलिए कायम हैं कि उनमें किसी जासूसी कैमरे वाला एक्स्पेरिमेंट नहीं किया गया है और इसी कारण बेवफाई का पता नहीं चल पाया है, या उन कपल्स में इतना भरोसा है और प्यार है कि उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।

देखा जाए तो आजकल के लव बर्ड्स काफी ओपन हैं। वे एक-दूसरे को स्पेस देते हैं, रिस्पेक्ट देते हैं, उन्हें उनके दोस्तों के साथ अक्सेप्ट करते हैं। ऐसी कोई शर्त नहीं होती कि लड़का या लड़की नए रिश्ते में बंधेंगे तो पुराने तोड़ देंगे, लेकिन लगता है कि यह सबकुछ भी कम पड़ रहा है। किसी को और अधिक स्पेस (दूसरे शब्दों में छूट) चाहिए तो कहीं किसी को और ज्यादा स्मार्ट पार्टनर की तलाश है। ये पुराने पार्टनर को एक सब्स्टिट्यूट की तरह साथ रखकर किसी और से फ्लर्ट करने में कोई बुराई नहीं समझते। मैं यहां यंग जेनरेशन को गलत ठहराने और पुराने कपल्स की तरफदारी करने की कोशिश नहीं कर रही क्योंकि एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात नई नहीं है। पहले भी वे होते थे लेकिन बात घर की चारदीवारी में दब कर रह जाती थी क्योंकि महिलाएं बाहर नहीं आती थीं। आज लड़कियां बड़ी संख्या में बाहर निकल रही हैं, इसलिए ऐसे अफेयर भी ज्यादा हो रहे हैं और सामने भी ज्यादा आ रहे हैं।

'इमोशनल अत्याचार' काफी हिट हो रहा है। लवर्स के एक-दूसरे को चीट करते रंगे हाथ पकड़े जाने पर ऑडियंस को बड़ा मज़ा आ रहा है। सोचती हूं, टीवी सेट के सामने बैठे लवर्स या कपल्स के दिमाग में प्रोग्राम देखते समय क्या गुज़रता होगा? क्या वे यह सोच कर खुश हो रहे होंगे कि हमारे जीवन में ऐसा कुछ नहीं है, या उनके दिमाग में भी शक का बीज पड़ रहा होगा? या फिर उनके अपने जीवन का कोई ऐसा ही सच उनके सामने नाचने लगता होगा?

Saturday, December 25, 2010

लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं ,प्याज़ दो ...

आजकल आम लोगो का जीना दूभर हो गया है जंहा देखो महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है और हाल ही में दूध के भाव  भी बढ़ गए हैं। दोस्तों , डेयरी भले ही मदर के नाम की है, पर वहां के भाव सुनकर ग्रैंडमदर याद आ जाती हैं। दूध के भाव बढ़कर जहां पहुंच रहे हैं, वहां पर उनके पहुंचने से आने वाले दिनों में चोरी की खबरें बदल जाएंगी। आने वाले दिनों में चोरी, डाके की कुछ खबरें इस तरह से होंगी।



आनंद विहार इलाके में चिर परिचित अंदाज में पुराने चोर नए मकान में घुसे और दूध को कब्जे में ले लिया। शोर मचाने के बावजूद चोर सारा दूध पीकर ही गए। चोरों ने सोने चांदी और दूसरे आइटमों को हाथ भी नहीं लगाया। ऐसा लगता है कि वह पहले से प्लानिंग करके दूध को ही निशाना बनाने के लिए आए थे। स्थानीय पुलिस ने साफ कर दिया है कि वह सोने चांदी की सुरक्षा तो कर सकती है, पर दूध के मामले में नागरिकों को खुद ही जागरूक रहना होगा। पब्लिक को यह करना चाहिए कि डेयरी से दूध लेने के बाद उसे सीधे बैंकों के लॉकर में जमा कर दे। खबरें हैं कि बैंकों ने दूध को लॉकर में रखने के भाव बढ़ा दिए हैं, क्योंकि कई ग्राहक एक बार दूध रखने के बाद कई सालों तक निकालने नहीं आते। पूरे इलाके में सड़े दूध की बदबू फैल जाती है।

प्रीत विहार इलाके में हुई राहजनी में सरेआम राहजन एक गृहिणी से दूध की तीन थैलियां छीन कर चले गए। गृहिणी ने दूध के बदले अपने जेवर देने की पेशकश की, तो चोरों ने कहा कि वह सिर्फ दूध ही लूटते हैं।

पिछले महीने प्याज़ 70  रुपये किलो बिक रही थी।  कुछ दिनों बाद इस तरह की खबरें आ सकती हैं :

जनकपुरी में दो परिवारों में प्याज़  को लेकर तनातनी हो गई है। सूत्रों के मुताबिक दोनों परिवारों के बच्चों की शादी के लिए तय मात्रा में सोना देने की बात तय हुई थी। बाद में लड़के वालों ने कहा कि सोना नहीं, हमें उसके बदले प्याज़ दी जाए। लड़की वालों ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा कि इस तरह से सोने की जगह प्याज़  नहीं लाई जा सकती। मूंग की दाल नब्बे रुपये किलो और अरहर की दाल 68 रुपये किलो चल रही है।

इनके भाव सुनकर हार्ट फेल होने की नौबत सी आ गई है। जल्दी ही दालों के भाव बताने का अंदाज भी बदलने वाला है। दस रुपये की अरहर बीस रुपये के मूंग के भाव होने वाले हैं। पर किलो के हिसाब के नहीं, दस रुपये में अरहर का एक दाना और बीस रुपये में मूंग का एक दाना दिखाया जाएगा। खरीदने के लिए तो बैंक गारंटी पेश करनी पड़ेगी। होम डिलिवरी की जाएगी, पुलिस प्रॉटेक्शन के साथ। कोई शरीफ ग्राहक एकाध किलो मूंग लेकर यूं ही निकल गया, तो राहजनी हो लेगी। चलूं, आज रात भर जागना है, क्योंकि चोरी का खतरा है, कल रात सौ ग्राम दूध बच गया है न।

Saturday, December 11, 2010

डीटीसी बसों की असलियत

 डीटीसी की बसों की 'असलियत' जानने के लिए जब डीटीसी के ही अफसर सड़कों पर आए तो उन्हें कई ऐसी कमियां नजर आई

 जो शायद इससे पहले उन्होंने कभी देखी ही न हों। कुछ रूटों पर तो उन्हें एक के बाद एक कई बसें साथ-साथ दौड़ती नजर आयीं जबकि कुछ रूट ऐसे भी थे, जहां लंबे इंतजार के बाद बस पहुंची भी तो इतनी भरी हुई कि पैसेंजरों के लिए उसमें चढ़ना ही मुश्किल था। यही नहीं, कई बसों में तो कर्मचारी वदीर् में ही नहीं थे। यह असलियत सोमवार को उस वक्त सामने आई, जब डीटीसी के लगभग दो सौ अफसरों को चेकिंग के लिए सड़कों पर उतारा गया। अब डीटीसी का कहना है कि इस फीडबैक के आधार पर ही आगे जरूरी बदलाव भी किए जाएंगे और हर पखवाड़े में इस तरह की एक्सरसाइज भी की जाएगी ताकि सड़कों पर बस सर्विस की असलियत सामने आ सके।
डीटीसी सूत्रों के मुताबिक डीटीसी चेयरमैन नरेश कुमार ने सड़कों पर चल रही डीटीसी बसों की परफॉर्मेंस जानने के लिए अपने विभाग के डिप्टी मैनेजर से लेकर चीफ जनरल मैनेजर स्तर तक के लगभग दो सौ अधिकारियों को बसों में जाकर उनका इंस्पेक्शन करने के निदेर्श दिए। इन अफसरों से कहा गया कि वे ये देखें कि बसें अपने तय शेडयूल के मुताबिक चल रही हैं या नहीं। बसों में सफाई कैसी है, कर्मचारियों का व्यवहार कैसा है और बसों के बोर्ड पर रूट नंबर आ रहे हैं या नहीं।

डीटीसी सूत्रों का कहना है कि इस निदेर्श के बाद लगभग दो सौ अधिकारियों ने दिल्ली में इन बसों का जायजा लिया। इनमें डीटीसी का ट्रैफिक स्टाफ भी शामिल था। सूत्रों का कहना है कि अब तक कुछ अफसरों ने अपना फीडबैक मैनेजमेंट को दिया है। इस फीडबैक में बताया गया है कि कुछ रूटों पर बंचिंग की समस्या सामने आई यानी एक के बाद एक कई बसें आ रही थीं और वे भी खाली। जबकि दूसरी तरफ कुछ रूटों पर बसों की कमी थी।

डीटीसी के ही एक अधिकारी ने उदाहरण देते हुए बताया कि बदरपुर से गुड़गांव के रूट पर बसें पैसेंजरों से बुरी तरह भरी हुई थीं यानी उस रूट पर बसों की तादाद कम है। इसी तरह कुछ जगह पर ड्राइवर-कंडक्टर अपनी वदीर् में ही नहीं थे।

डीटीसी चेयरमैन नरेश कुमार ने एनबीटी को बताया कि इस फीडबैक से यह पता चला है कि कुछ जगह बसों के टाइम टेबल को रिशेड्यूल करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फीडबैक के आधार पर आगे जो भी जरूरी कदम हैं, वे उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह एक्सरसाइज हर 15 दिन में की जाएगी ताकि अपडेट मिलता रहे। उन्होंने कहा कि डीटीसी को जल्द ही और ड्राइवर मिल जाएंगे, इसके बाद वह अपनी पूरे बेड़े का 90 फीसदी बसें सड़कों पर उतार सकेगी। वैसे सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर डीटीसी की 4929 बसें चलीं।

Thursday, December 2, 2010

. और ख़त्म हो गया नालंदा विश्वविद्यालय......

 नालंदा विश्वविद्यालय, वास्तव में उसका नाम नालंद था, जिस तरह अंग्रेजी के कारण योग को योगा, मिश्र को मिश्रा आदि बना दिया ऐसे ही नालंद के नाम में भी परिवर्तन हुआ | नालंद का संधि विग्रह है न + आलम+ द | अलम शब्द का अर्थ है पर्याप्त ,इस प्रकार उसका अर्थ हुआ पर्याप्त से अधिक शिक्षा देने वाला | वैसे नालंदा के बारे में काफी पढ़ा... था और सुना था लेकिन ये नहीं पता की उसका विनाश कैसे हुआ ? अभी पढ़ा तो पता लगा की अलाउद्दीन खिलजी के भतीजे बख्तियार खिलजी ने इस विश्विद्यालय को समाप्त कर दिया, नालंदा की इमारत को ज़मिदोज़ करा कर वहाँ के छात्र ,आचार्यों को मार दिया | वहाँ के पुस्तकालय में आग लगा दी गयी, और वहाँ का पुस्तकालय पुस्तकों से इतना समृद्ध था की वहाँ लगी आग छह महीने तक जलती रही थी | 

इसे पढ़ कर दिमाग में एक प्रश्न आया की पुस्तकालय को यदि न जलाया गया होता तो कितनी कीमती और ज्ञानवर्धक पुस्तकें आज हमारे पास मौजूद होती | क्योकि कहा जाता है की किसी देश का साहित्य या पुस्तकें/ग्रन्थ/ उसकी अमूल्य धरोहर होती है और संस्कृतिक सम्पन्नता को प्रदर्शित करती है | इसके बाद एक प्रश्न और कौंधा की जब मुगलों ने इतने अत्याचार हमारे देश पर किये है तो हम क्यों पांचवी कक्षा से बी.ए., एम.ए और आगे भी हम इन मुगलों को पढ़ रहे है क्या ये एक ज़ख्म कुरेदने जैसा नहीं है, और जो पढ़ रहे है वो भी वास्तविकता नहीं है ज्यादातर बातें छुपा दी गयी जैसे उनका धर्म परिवर्तन करना, न मानने पर सर कलम कर देना, मंदिरों को तोडना, और उनको लूटना,हिन्दू प्रजा पर अन्यों के मुकाबले दोगुना कर लगाना,ज्यादातर धार्मिक त्योहारों पर रोक लगा देना , आदि आदि | समझ नहीं आता की क्यों हमारी सरकार या शिक्षा संस्थान कोई वाजिब कदम उठा कर शिक्षा का स्वरुप नहीं बदलते ? क्या हमारा इतिहास सिर्फ मुगलों तक सीमित था, क्या हमारा हमारे पास मुगलों को पढने के अलावा कोई और चारा नहीं है | हर देश में स्वतंत्रता के बाद हर उस चीज़ के निशाँ मिटाए जाते है जो गुलामी के प्रतीक होते है और एक हम है जो सिर्फ गुलामी के प्रतीकों को अपने भविष्य में ढ़ो रहे है,और संजो के रख रहे है . 

Saturday, November 27, 2010

दिल्ली दिल वालो की

   सब इसे गरियाते रहते हैं। हर तीसरा शख्स इसकी कमियां गिनाता दिख जाएगा। बातचीत में जरा-सा छेड़ने भर की देर है, इसकी खिंचाई करते समय हर कोई लाठी लेकर दौड़ पड़ता है। आप कहेंगे - ये कौन? अरे दिल्ली, और कौन।

पूछिए, दिल्ली कैसी है? दिल्ली-बॉर्न कहेंगे, दिल्ली बहुत प्यारी है। लेकिन जो यहां पैदा नहीं हुआ और खाने-कमाने के लिए दिल्ली में आ बसा है, वह कहेगा, बस कट रही है किसी तरह... वरना यहां धरा ही क्या है। लोग ऐसे हैं, लोग वैसे हैं, सिस्टम ऐसा है, सिस्टम वैसा है.. और फिर शुरू होगा दिल्ली की मिट्टी पलीद करने का अंतहीन सिलसिला। सच तो यह है कि दिल्ली से बाहर से आ कर बसे लोग नहीं जानते हैं कि इसके बारे में प्यारा क्या है? या फिर वे जानते तो हैं पर सबके सामने स्वीकारना नहीं चाहते। न स्वीकारें, किसका क्या जाता है? दिल्ली का कुछ नहीं बिगड़ता। दिल्ली अगर एक व्यक्ति का नाम है तो दिल्ली की पर्सनैलिटी में एक कंसिस्टेंसी तो है ही।



दिल्ली यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल आदि से आए और यहां फल-फूल रहे लोगों की गालियां सुन कर भी नित नए आंगुतकों को दुत्कारती नहीं। दिल्ली का यह स्वभाव ही नहीं कि वह दुत्कारे, भगा दे। अरे भई, दिल्ली मुंबई थोड़े ही है। मुंबई में तो दो जून की रोटी भी भारी पड़ जाती है और जहां कभी-कभी स्टार-यार-कलाकार बनने का सपना ले कर आया आदमी जब पूरी तरह से निराश हो जाता है तो वापस लौट जाता है, अपने गांव कस्बे की ओर। दिल्ली कभी भी नहीं दुत्कारती। दिल्ली तो कहती है,  'भई अपने-अपने हिस्से का सपना यहां जियो। जैसा यहां रहना चाहते हो, रहो। जो करना चाहते हो, करो। तुम्हारी संस्कृति और तुम्हारे लाइफस्टाइल को मैं अपने साथ ऐसे घुलामिला लूंगी कि तुम यहां से जाना ही नहीं चाहोगे।'

ऐसा होता भी है। राजधानी की मुख्यमंत्री ने कहा कि बाहर से आए लोगों की वजह से दिल्ली पर दबाव बढ़ा है। लोगों को बुरा लगा। इन लोगों में दिल्ली बॉर्न भी थे, और बाहरी प्रदेशों के लोग भी। मैडम मुख्यमंत्री की हिम्मत कैसे हुई यह बोलने की - रिसोर्सेज़ कम हैं तो रिसोर्सेज़ बढा़ओ। यह क्या कि यूपी-बिहार के लोगों पर चिल्ला-चिल्ली कर दी और अपनी असफलता उनके सिर मढ़ दी।

दिल्ली में पैदा हुआ कोई बिजनसमैन अपने यहां नौकरी देते समय यह नहीं देखता कि उसे अपने यहां एंप्लॉईज केवल और केवल मूल दिल्लीवासी ही रखने हैं। ऐसा न करने के पीछे उसकी कारोबारी जरूरतें हो सकती हैं पर फिर भी क्या कोई अनकहा क्राइटीरिया आपने देखा है जहां नॉन-डेल्हीआइट के लिए नो एंट्री हो?

मैं यही पढ़ी, पली, बड़ी हुई। मैंने खुद में या मेरे आसपास के ऐसे लोगों में, जो यहीं पैदा-वैदा हुए, कुछ ऐसा अलग नहीं देखा जो उन्हें यूपी, एमपी या बिहार के सेम परवरिश और सेम बैकग्राउंड वाले से अलग-थलग करता हो। फिर ऐसा क्यों है कि कह दिया जाता है कि ओहो,  दिल्ली के ही हो। तभी ऐसे हो। यह 'ऐसे हो'  क्या है? इसका मतलब यह बताया जाता है कि आप तेज तर्रार हैं, आप किसी की नहीं सुनते हैं, आप फैशनपरस्त हैं, आपके कैरक्टर में भी कोई न कोई,  छोटा या बडा़, लोचा है, महिला-पुरुष संबंधों को लेकर आप शर्तिया बिंदास हैं, आपने जीवन में कोई समस्या नहीं देखी है और ऐश करते हैं, ऐशोआराम से जीते हैं, आपका कोई न कोई ऊंचा रसूख जरूर है। कोई-कोई शरीफ दिखता भले ही हो पर ये लोग जुगाड़ू हैं...।

असलियत तो यह है कि दिल्ली में अपनी एक पीढ़ी से ज्यादा समय से यहीं बस रहे बंदे को जब बिहारी लिट्टी-चोखा खिलाता है तो मज़ा आ जाता है।  न जाने कितनी जरूरतें और भावनाएं जुड़ जाती हैं अपने आसपास के लोगों से। क्या फर्क पड़ता है कि वे कहां से हैं... और अगर वे कहीं बाहर (दिल्ली )  से भी हैं तो यह तो और अच्छा ही साबित होता है!!!

एक बात और,  जो कुछ ऊपर मैंने कहा, उससे यह न समझ लें कि मुंबई की बुराई कर रही हूं या मुंबई को कम आंक रही हूं। मुंबई कई मामलों में दिल्ली से कई गुना अच्छी है। सुरक्षा के मामले में तो दिल्ली से कई कदम आगे है। पर दिल्ली वाले और दिल्ली, ये सब इतना बुरा नहीं है जितना बता दिया जाता है। और अगर, दिल्ली में दिल्ली वालों में कुछ बुरा है तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि जिन लोगों से मिलकर यह बनी है, उनमें कुछ केमिकल लोचा है।

वे लोग जो बाहर से यहां खाने-कमाने आए, उन्होंने इसे मैला किया? या वे लोग, जिनकी पैदाइश परवरिश यहीं हुई, वे अचानक अमुक प्रदेश के लोगों से उनकी पहचान मालूम होते ही बुरा सलूक करने लगते हैं? मैं अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। मुझे तो यह लगता है दिल्ली एक नदी है जो सदियों से बह रही है और उसमें समय के साथ-साथ कुछ गंदगी जा मिली है। यह गंदगी हमने ही डाली है। हम यानी दिल्ली की कुल जमापूंजी इसकी आबादी। अब जब यह बदबू देने लगी है तो हम चिल्लाने लगे हैं। क्या इस गंदगी को साफ करने की अपने- अपने हिस्से की जिम्मेदारी हमें लेनी नहीं चाहिए?

Tuesday, November 23, 2010

ट्रेड फेयर.का आनंद

दिल्ली वालों की घणी आफत है। इत्ते किस्म के मेले-ठेले दिल्ली में लगते हैं कि उन्हें देखने जाए, तो आदमी बस उन्हीं का होकर रह जाये। ट्रेड फेयर हर साल आता है। इसमें इतनी अनफेयर चीजें होती हैं कि क्या बताया जाए, पार्किंग से लेकर खाने-पीने के आइटमों के भाव देखकर लगता है कि कलमाडी जी सिर्फ कॉमनवेल्थ गेम्स में ही नहीं है। ट्रेड से लेकर फेयर तक सब जगह कलमाडी ही कलमाडी ही हैं।

खैर मसला यह है कि जिन दिनों दिल्ली में ट्रेड फेयर चलता है, उन दिनों दिल्ली की आबादी को सिर्फ दो ही भागों में डिवाइड किया जा सकता है। एक तो वे जिन्होंने ट्रेड फेयर देख लिया, और दूसरे वे जिन्होंने ट्रेड फेयर नहीं देखा। ट्रेड फेयर देखने वाले ट्रेड फेयर न देखने वालों को इस निगाह से देखते हैं, मानो अमेरिका वाला कोई बंदा इथियोपिया के बंदे को देख रहा हो। दिल्ली में रहे और ट्रेड फेयर नहीं देखा, तो क्या देखा - टाइप भाव हवा में तैरता रहता है।

इस खाकसार ने एक ट्रेड फेयर गाइड लिखी है, जिसे पढ़कर लोग बगैर ट्रेड फेयर जाए हुए ही खुद को ट्रेड फेयर में गया घोषित कर सकते हैं। इस गाइड के कतिपय महत्वपूर्ण अंश इस प्रकार हैं-

1. जब आपसे कोई पूछे कि ताइवान से आया हुए वो वाला बिजली का उपकरण देखा या नहीं, आप फौरन पूछें कि अरे फॉरेन हाल में वो वाला कंप्यूटर देखा कि नहीं, जिसमें आदमी को कंप्यूटर फाइल में कन्वर्ट करके उसका ईमेल कर दिया जाता है। दिल्ली से ईमेल करो तो बंदे को डाउनलोड करो अमेरिका में।  इस डिवाइस को सुनने के बाद किसी की हिम्मत नहीं है कि आपसे पूछ ले कि वह मशीन या यंत्र देखा या नहीं।

2. बहुत ठगी है - यह बात आप आंख मूंदकर ट्रेड फेयर के बारे में कह सकते हैं। कोई भी यकीन कर लेगा। ठगों और ठगी पर पब्लिक का भरोसा इतना पक्का हो गया है कि पब्लिक मानकर चलती है कि ठगी तो एकदम नेचरल तो एकदम नेचरल चीज है, ईमानदारी कहीं कहीं और कभी कभी दिखती है और कम से कम दिल्ली में तो नहीं दिखती।

3. इस बार के मेले में वह बात नहीं है। यह भी एकदम सेफ टाइप का स्टेटमेंट है, जिससे हर कोई सहमत हो सकता है। किसी भी मेले में वो वाली बात नहीं होती, जो पहले के सालों में मेले में होती है। पिछले साल लुच्चों ने जिन लड़कियों को घूरा था, वो इस साल नहीं आयीं, ससुराल चली गईं। इस साल जो लड़कियां आईं हैं, वो अगले साल ना आएंगी। कुल मिलाकर लुच्चों से लेकर सच्चे तक यह बयान दे सकते हैं कि इस बार के ट्रेड फेयर में वह बात नहीं है।

4. हमारे रामपुर में मेला इससे भी बड़ा लगता है - यह बात बेखटके कही जा सकती है टिपिकल दिल्ली वाले से। टिपिकल दिल्ली वाले को पूरी दिल्ली का ही पता नहीं होता, दिल्ली के बाहर के इलाकों के बारे में उससे बेतकल्लुफ होकर झूठ बोला जा सकता है।

5. अब ट्रेड फेयर का क्राउड कुछ ऐसे ही टाइप हो गया है। सब इससे सहमत होंगे। दिल्ली वाले खुद को छोड़कर बाकी सबको ऐसा-वैसा क्राउड ही मानते हैं। 

Sunday, November 14, 2010

क्या है मेरी गलती ?

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ..

मुझे भी जीने का अधिकार है,
पर लगता है ..अब सब ख्वाब है !
सदियों का अँधियारा ओढ़े,
मैं उजियारा खोज रही हूँ !
संशय के इस कूड़े में ,
मैं एक सहारा खोज रही हूँ !

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........

करते करते विरोध अब थक चुकी हूँ ,
पुरुषो कि इस दुनियां  से अब, ऊब चुकी हूँ !
 बीच सड़क पर जब भी चलती ,
हज़ार निगाहे है मुझे घूरती !
मुझे देख न जाने कितने मुस्काते ,
और कितने ही ललचाते  !

क्या है मेरी गलती ?
कि हूँ मैं एक लड़की ........

मैं उन लोगो के चहरे भूल नहीं पाती,
और इसी डर से रात भर सो नहीं पाती !
जाने कल का सवेरा क्या दिखलाएगा और फिर ना जाने ...
कल कौन  सा हादसा हो जाएगा.............
                                     प्रतिभा

Thursday, November 11, 2010

जलवा

खबर है कि दिल्ली में जितने इंसान दिखते हैं, उससे ज्यादा संख्या मोबाइलों की है। दिल्ली में कुल इंसानों की तादाद 1 करोड़ 83 लाख है, पर मोबाइलों की संख्या इससे 1 करोड़ ज्यादा यानी 2 करोड़ 83 लाख है।
आदमी कम हैं, मोबाइल ज्यादा है। वैसे दिल्ली में आदमी कम ही हैं, दिखते भर ज्यादा हैं। दिल्ली में आम तौर पर आदमी इतनी स्पीड से भागता दौड़ता रहता है कि वह आदमी कम, मोबाइल ज्यादा लगता है। जैसे आदमी-आदमी में फर्क है, वैसे ही मोबाइल-मोबाइल में फर्क है।

आदमी-आदमी के स्टेटस में फर्क है और मोबाइल-मोबाइल स्टेटस में फर्क है। मोबाइल स्टेटस को लेकर कई लोगों में कई भ्रांतियां हैं। इस कॉलम में उन भ्रांतियों को दूर करने की कोशिश की गई है। निम्नलिखित सवाल-जवाबों से अपनी भ्रांतियां दूर करें।
सवाल: मैंने 70,000 रुपये का मोबाइल खरीदा है। इससे अपना जलवा कैसे कायम किया जा सकता है।
जवाब: देखिए इसे जेब में रखकर न चलें। खुलेआम हाथ में रखकर घूमा करें। हो सकता है कि इससे मोबाइल की सेफ्टी कुछ कम हो जाए, पर इससे आपका स्टेटस बढ़ लेगा। स्टेटस चाहिए, तो सेफ्टी पर आपको कंप्रोमाइज करना होगा। जहां भी कोई बंदा नजर आ जाए, फौरन मोबाइल हाथ में लेकर मोबाइल पर कुछ बात करने का अभिनय करिए।
बीच-बीच में सामने वाले बंदे की ओर भी देखते रहिए। वह कुछ न कहे, तो अपनी तरफ से कहिए - इत्ता महंगा मोबाइल, फिर भी सारे फीचर नहीं हैं। यह सुनकर सामने वाले में अगर थोड़ी भी तमीज होगी, तो वह पूछेगा - कित्ते का लिया। तब फौरन आप जुट जाइए, यह बताने में कि 70,000 का है। बहुत महंगा है। इसमें ये ये फीचर हैं। आदमी को फाइल बनाकर ई-मेल कर सकते हैं इस मोबाइल से।

इस मोबाइल में लता मंगेशकर का गाना ऐसे आता है, मानो वह मोबाइल से बाहर निकल कर आपके लिए खुद गाने लगती हैं। जब सुनने वाला थोड़ा चकराए, तो आप कहिए, ये सारे फीचर्स बताए गए हैं। अभी टेस्ट करके नहीं देखे हैं। फिर आप बताइए कि मोबाइल फोन तो ऐसा होना चाहिए, जिसमें आदमी की आवाज ही नहीं, खुद आदमी निकल कर बाहर आ जाए। अगर आपके 70,000 के मोबाइल के बारे में फिर भी कोई न पूछे, तो इसके म्यूजिक प्लेयर को फुल वॉल्यूम के साथ ऑन कर दीजिए और उसमें 'मुन्नी बदनाम हुई' या इसी प्रजाति का कोई गाना बजाइए।

फुल वॉल्यूम सुनकर कुछ लोग ऑबजेक्शन करेंगे, तो उन्हे बताइए कि यह बहुत महंगा वाला मोबाइल है 70,000 रुपये का। इसके म्यूजिक प्लेयर को ऑन करना तो उन्हें आता है, पर ऑफ करना नहीं आता।

सवाल: मेरे पास 1,000 रुपये वाला मोबाइल है। इससे स्टेटस कैसे बनाया जा सकता है।
जवाब: यू चिरकुट, 1,000 रुपये में स्टेटस बनाएगा। इस मोबाइल से कम से कम बात की जाए और बात करने के फौरन बाद इसे जेब में रख लिया जाए। ये मोबाइल किसी को दिखना नहीं चाहिए। वरना लोग आपको दो कौड़ी का आदमी समझने लगेंगे। आजकल बंदे का कैरेक्टर नहीं, मोबाइल देखा जाता है। अच्छे कैरेक्टर वालों के मोबाइल अच्छे नहीं होते, और बुरे कैरेक्टर वालों के मोबाइल बुरे न होते।

यानी अपना कैरेक्टर खराब करने में लग जाएं, स्मगलिंग जैसे किसी काम की तरफ रुख करें। स्टेटस के साथ मोबाइल भी सुधर जाएगा। जी, आजकल के टाइम में कोई आदमी या ना सुधरे, मोबाइल जरूर सुधरा हुआ होना चाहिए।

Monday, October 25, 2010

इसकी टेंशन, उसकी टेंशन पता नहीं किस किस की टेंशन...........

आज सुबह से ही किसी बात को लेकर मैं टेंशन में थी तो अचानक मन में ये बात आई  कि आखिर ये टेंशन क्यों होती है ? तो सोचा क्यों ना टेंशन को मेंशन किया जाये  वैसे दोस्तों कमाल की चीज़ है ये टेंशन..इसके जलवे तो हर जगह देखने को मिलते है माफ़  कीजिए  ये तो कहानी घर घर कि है  और तो और कोई हीरो हिरोइन पॉपुलर  हो ना हो जनाब  ये टेंशन बहुत मशहूर होती जा रही है खास तौर से  शहरों में !कभी अपने पुराने मित्रो से मिलने जाओ तो मिलने कि ख़ुशी से ज्यादा उनकी टेंशन में होने कि कहानियां  सुनने में समय बीत जाता है ,पड़ोसियों को सामने  वाले के घर  को देख टेंशन ,बच्चो  को पढाई कि टेंशन,माँ बाप को बच्चो कि टेंशन , बीबी को घर पर रोज खाना बनाने की  टेंशन ,पति को रोज़ काम पर जाने कि टेंशन, कवारों को शादी की टेंशन , लड़के को लड़की की टेंशन,,,इसकी टेंशन, उसकी टेंशन पता नहीं किस किस की टेंशन...........
        ऊफ .... आखिर ये टेंशन होती क्यों है ? इसका जवाब देना मेरे लिए भी मुश्किल है क्योंकि मैं भी इस टेंशन की शिकार हूँ ,लेकिन दोस्तों शायद इसका जवाब हमारी खुद की ज़िन्दगी में मिल जाएगा ....वो कैसे ? तो सोचिए क्या हम पहले की तरह बाहर निकल कर खुली हवा में रहते  है ,क्या माँ बाप अपने बच्चे को समय देते है ,क्या बच्चे कम्प्यूटर की दुनियां  के आलावा किसी और  को अपना दोस्त मानते है ...आज किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है  और बस अगर  हमें कोई समय देता है या हम किसी को समय देते है तो वो केवल हमारे अपनी टेंशन को .........
आज भी मुझे वो समय याद है जब मैं ८ साल की थी और १५ अगस्त को अपने भईया के साथ छत्त पर पतंग उड़ाने गयी थी वो बात अलग है की मुझे हमेशा की तरह चरखी पकड़ा दी गयी  लेकिन मुझे उस में भी बहुत ख़ुशी मिलती थी और सबसे ज्यादा उन रंग बिरंगी पतंगों को देख कर जो सारे आसमान को रंगीन कर देती थी और मैं भईया से कहती थी भईया आज तो लाखो पतंगे उड़ रही है ना ....अगर ये सारी पतंगे हमारे पास आ जाए तो कितना मज़ा आयेगा ना ... फिर मेरे भईया मेरी तरफ देख कर हंसने  लगे ! वैसे आप सोच रहे होंगे की मैंने ये बात आपको क्यों बताई क्योंकि आज ना मुझे वो बच्चो की "आई बो" का शोर  सुनाई देता  है और ना ही वो रंगीन असमान दिखाई पड़ता है ! लोग कहते है शहर में समय चलता नहीं  दौड़ता है और समय के साथ हमें दौड़ना पड़ता है लेकिन  शायद इस दौड़ हम कही ना कही अपनी खुशियाँ ,अपने और अपने दोस्तों को पीछे छोड़ते जा रहे है बस आज कोई सबकी ज़िन्दगी में अव्वल  है तो वो है टेंशन .....इसलिए अपनी ज़िन्दगी का थोडा समय अपने अपनों को दे ताकि इनकी जगह  कोई टेंशन ना ले सके ....".ना टेंशन लेने का और ना किसी को देना का ".........

Wednesday, October 20, 2010

कब सुधरेंगे ये पाकिस्तानी

वैसे तो मुझे भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई बातें समझ में नहीं आती, लेकिन यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती कि अचानक बैठे बिठाए बात प्यार, मुहब्बत और शांति से शुरु होते होते गाली-गलौज में कैसे बदल जाती है.कभी कभी तो मेरी समझ से बाहर हो जाता है कि हमारे देश को क्या हो जाता है .माफ़ किजिएगा इस देश को चलने वाले नेताओ को .जब देखो शरीफ  बनने का ढोंग करते रहते है कभी पाकिस्तान के लिए इतना प्यार उमड़ जाता है कि जिसकी  कोई सीमा नहीं वही पाकिस्तान पीठ में छुरा घोपने से बाज़ नहीं आता . वैसे आज मेरे एक मित्र के पास एक साईट पर फ्रेंड रिकुएस्त  आई जिसे देख कर ऐसा लगा जैसे इन पाकिस्तानी बेशर्मो का कुछ नहीं हो सकता किसी ने सही कहा है लातो के भुत बातो से नहीं मानते .

भारत- हम पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिरता चाहते हैं. एक मज़बूत पाकिस्तान भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के हित में है.
पाकिस्तान- हम भारत के साथ समग्र बातचीत का स्वागत करते हैं. दोनों देशों का नेतृत्व धीरे-धीरे सभी समस्याएं शांति प्रक्रिया के ज़रिए हल करने की क्षमता रखता है.
भारत- हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़े और वीज़ा नियमों में नरमी हो.
पाकिस्तान- यदि नियंत्रण रेखा की दोनों ओर से व्यापार और लोगों की अवाजाही में आसानी हो तो धीरे-धीरे सीमाएँ बे-मानी होती जली चाएँगी.
भारत- दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया अब पीछे नहीं जा सकती, लेकिन पाकिस्तान को सबसे पहले अपने यहाँ आतंकवाद के ख़िलाफ ठोस क़दम उठाने होंगे.
पाकिस्तान- दक्षिण एशिया को भारत और पाकिस्तान शांति का केंद्र बना सकते हैं, लेकिन भारत को बलोचिस्तान में हस्तक्षेप बंद करना होगा.
भारत- जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना रहेगा, बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं.
पाकिस्तान- भारत को आरोप-प्रत्यारोप से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और इलाक़े में दादा बनने का शौक़ अपने मन से निकाल देना चाहिए.
भारत- अगर चीन और पाकिस्तान से एक ही समय पर युद्ध होता है तो भारत दोनों का एक साथ मुक़ाबला करने की क्षमता रखता है.
पाकिस्तान- जनरल दीपक कपूर को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान क्या कर सकता है और भारतीय सेना कितने पानी में है.
भारत- अब तक सीमा पार से आतंकवाद हो रहा है. अमेरिका और अन्य शक्तियाँ पाकिस्तान को समझाएँ कि वह आग से न खेले.
पाकिस्तान- जिस प्रकार से हम ने पाकिस्तान हासिल किया है उसी प्रकार से कशमीर भी हासिल करेंगे. चाहे हज़ार साल तक युद्ध क्यों न करना पड़े.
भारत- क्या पाकिस्तान भूल गया कि सन् 71 में क्या हुआ था. क्या उसे दोबारा याद दिलाना पड़ेगा.
पाकिस्तान- हमारी ओर जो भी मैली आँख से देखेगा वह आँख निकाल दी जाएगी.
भारत- पाकिस्तान अपने क़द से बड़ी बात करने से पहले अपने घर की आग तो बुझाले.
पाकिस्तान- अबे तेरी तो....
भारत- अबे तेरी ऐसी की तैसी.....
(यदि भारत और पाकिस्तान किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करने पर तैयार हो जाएँ तो इलाज के पैसे मैं अपनी जेब से देने को तैयार हूँ.)

Friday, October 15, 2010

यौन शोषण के शिकार होते बच्चे

कल पूरे दिन हर न्यूज़ चैनल में एक ही खबर छाई थी कि दिल्ली में  कैसे एक व्यक्ति ७ महीनो से तीन बच्चो को अपनी हवस का शिकार बना रहा था  और माता पिता को पता भी नहीं चला वैसे ये कोई नयी खबर नहीं है क्योंकि आज हर दूसरा बच्चा अपनों का ही शिकार बन रहा है ! वैसे देखा जाए तो  देश में अगर किसी बच्चे के साथ यौन शोषण होता है तो उसके लिए अलग से कोई कानून नहीं है। एक वयस्क के साथ होने वाले यौन शोषण मामले में जो कानूनी प्रावधान है वही प्रावधान बच्चों के यौन शोषण के मामले में भी है। जबकि सरकार को भी ये अच्छी तरह पता है कि भारत में हर दूसरा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है।
बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए तीन साल पहले ऑफेंसेज अगेंस्ट चाइल्ड बिल तैयार कर दिया गया है लेकिन ये बिल तीन साल से ठंडे बस्ते में पड़ा है। जबकि सरकार के अपने ही आंकड़ों के मुताबिक देश भर में पांच साल से ज्यादा उम्र के 53 फीसदी बच्चे किसी न किसी तौर पर यौन शोषण के शिकार होते हैं लेकिन शर्म कि बात तो यह है कि सरकार  सब जानने के बाद भी कोई सख्त कदम नहीं उठाती वैसे सरकार पर निर्भेर रहने से अच्छा माता पिता को ही अपने बच्चो की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए !

Monday, September 27, 2010

कौन है ज़िम्मेदार ????

राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर जो भारतीय कभी उत्साहित हुआ करते थे  आज वही भारतीय ख़ुद को शर्मिंदा महसूस कर रहे है  और खेलों की आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और खेल मंत्री एमएस गिल तक सब आलोचनाओं के निशाने पर हैं ! लेकिन क्या गलती सिर्फ इनकी है ? आज सवाल को कई है पर जवाब सिर्फ चुनिन्दा !जो मेहनत दिल्ली सरकार अब कर रही है जब  राष्ट्रमंडल खेलों को शुरू होने में केवल ६ दिन बाकि है वही मेहनत ४ साल पहले की होती तो आज दिल्ली और देश को इतना शर्मिंदा न होना पड़ता !आज हालत तो ये है कि कई विदेशी खिलाडी भारत आना ही नहीं चाहते और जो आ रहे है वो यहाँ आकर खुश नहीं है !
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने काम समय से न होने पर ना जाने किस किस को फटकार लगायी लेकिन सवाल उठता है कि इतने दिनों तक वह कहाँ थे जब खेलो का काम रेंगते हुए किया जा रहा था ! जिन खेलों को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया उसकी तैयारी सही चल रही है या नहीं ये समय रहते देखना क्या प्रधानमंत्री का काम नहीं था?
कलमाड़ी ने इस साल की शुरुआत  में कहा था कि हर चीज़ की आख़िरी ज़िम्मेदारी मेरी है क्योंकि मैं आयोजन समिति का प्रमुख हूँ लेकिन कलमाड़ी जी अब आपको क्या हुआ ?इतनी शर्मिंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए आप सामने क्यों नहीं आते और अब आपसे ये भी नहीं कहा जा रहा कि इस सारी गड़बड़ी , नकामियाबी और बदनामी के प्रमुख आप है !
वैसे इन खेलो में जो हजारो करोडो रुपए स्वाहा किये गए काश ये इस देश कि गरीबी,पढाई , इलाज और उन इलाको में लगाये जाते जहा लोग बाढ़ और सूखे से ग्रस्त है जिन्हें एक वक़्त कि रोटी तक नहीं मिलती! लेकिन इन खेलो के कारण कुछ लोगो को फायदा भी हुआ हमारे देश के गरीब नेताओ को, जो बेचारे इस देश का पैसा खाते खाते थकते ही नहीं !
                                       यह मेरा देश है
                                      हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
                                       फैला हुआ,
                                       जली हुई मिट्टी का ढेर है
                                       जहा हर तीसरी जुबान का मतलब -
                                       नफरत है !
                                      साजिश है !
                                       अँधेरा है !
                                     यह मेरा देश है ! 

Sunday, September 26, 2010

दूर जाती हिंदी ???????

"भारत माता की बिंदी हूँ
मैं तुम्हारी हिंदी हूँ
यह ना पूछो मुझसे ,
की हाल मेरा कैसा है
अपनों के बिच पराये जैसा है !"

पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों और न्यूज़ चेंनलो ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का इस्तेमाल धड़ल्ले से शुरू कर दिया है.
इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको इस्तेमाल करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट !  लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषा का ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है? चाहे जो भी हो लेकिन आज का युवा हिंदी बोलने में अपने आप को असहाय महसूस करता है शायद इसके ज़िम्मेदार  कुछ ऐसे स्कूल भी है जो हिंदी को अपने स्कूल के विषयों में जगह नहीं देते आज इनकी जगह इंग्लिश,फ्रेंच जैसे विषयों ने ले ली है और तो और अब तो युवाओ को भी हिंदी बोलने में शर्म आती है !
क्या ऐसे बच पाएगा हमारी मात्र भाषा का अस्तित्व ? क्या संस्कृत के बाद हिंदी भी लुप्त हो जाएगी ?
" हिंदी हमारी मात्र भाषा है ,मात्र एक भाषा नहीं ".....